
ईश्वरीय विधान
जब दूसरे साथ होते हैं तब भगवान का पता नहीं लगता । हम अकेले होते हैं तब भगवान का पता चलता है कि वह हमारी कैसे सहायता करता है? जिसने आपको मुख दिया ,शरीर दिया ,पेट दिया उसी ने रोटी दी है । आपकी एक-एक चेष्ठा भगवान की दृष्टि में है / जीवन में जो भी घटना घटे , उसमें भगवान का हाथ ,भगवान की करुणा देखो। भगवान की कृपा को भली प्रकार देखते हुए, अपने शुभाशुभ कर्मफल भोगते हुए ; हृदय, वाणी और शरीर से जो भगवान के सम्मुख नत रहता है , मुक्ति पद का, प्रभु के प्रेम का वह सच्चा अधिकारी है।
“जीवन की किसी घटना का कर्ता कोई मनुष्य नहीं , ईश्वर है । अतः जब तुम किसी काम करने वाले को गाली देते हो तो वह सीधे ईश्वर को जाती है।”
एक बार किसी बड़े पंडित ने कोई बात कही। बात मुझे जँची नहीं । मैंने कह दिया- ‘किस मुख ने ऐसा कहा है?’ उन पंडित ने मेरे गुरु जी का नाम लेकर कहा – ‘उन्होंने कहा है।’ मैं – ‘तब तो ठीक कहा है।’ पंडित जी- ‘पहले गाली दे दी अब कहते हो ठीक कहा है।’
इसी प्रकार हम कार्यों को दूसरों का किया मानकर गाली देते हैं । जैसे खीर खिलाने वाला चटनी, नमक-मिर्च भी परोसता है कि इन्हें बीच-बीच में खाने से खीर का स्वाद बढ़ जाता है , वैसे ही भगवान बीच-बीच में अपमान, दुःख, अभाव, रोग हमारा अभिमान तोड़ने के लिए भेजते हैं। जो साधक इस मर्म को जान लेता है, उसका चित्त सदा शांत और आनंदमयी रहता है।
ग्रंथ : कपिलोपदेश (पृ : 134, 136)
“आनन्द रस रत्नाकर” नामक ग्रंथ से 07 जुलाई का लेख
(संकलन : स्वामी गोविन्दानन्द सरस्वती)
- एकांत का महत्व: सांसारिक संगति में जीव विचलित रहता है, जबकि एकांत की घड़ियों में प्रभु की साक्षात सहायता और उपस्थिति का गहरा भान होता है।
- समर्पण और मुक्ति: जो प्रत्येक परिस्थिति में ईश्वर की करुणा देखता हुआ तन, मन और वाणी से उनके सम्मुख नतमस्तक रहता है, वही प्रभु प्रेम का वास्तविक अधिकारी है।
- अभिमान भंजन: जीवन में आने वाले दुःख, रोग और अपमान कोई संजोग नहीं, बल्कि साक्षात ईश्वर द्वारा जीव का सूक्ष्म अहंकार नष्ट करने के लिए परोसी गई ‘चटनी और नमक-मिर्च’ के समान हैं।
