प्रेम तत्त्व का साकार दर्शन: पूज्य स्वामी आत्मानंदगिरि जी की दिव्य अनुभूति (स्मृति कुसुमांजलि)

प्रेम-तत्त्व का साकार दर्शन और अंतःकरण शुद्धि

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दिव्य संस्मरण: स्वामी श्री आत्मानंदगिरि जी महाराज की अलौकिक अनुभूति (स्मृति कुसुमांजलि – पृष्ठ १४१)

रमआदरणीय स्वामी श्री आत्मानंदगिरि जी महाराज उच्च कोटि के साधक भक्त रहे हैं। आज श्री हरि बाबा जी महाराज स्मृति कुसुमांजलि पृष्ठ संख्या १४१ पर उन्हीं का लिखा एक दिव्य संस्मरण मिला, जिसमें कि परम आदरणीय श्री श्री १०८ श्री हरिबाबाजी महाराज ने स्वामी जी के ध्यान क्षेत्र में प्रवेश कर उनके प्रश्न का उत्तर दिया और साधन पुष्ट किया। आगे श्री स्वामी जी के शब्दों में ही उनकी दिव्य अनुभूति इस प्रकार है।

परम पूज्य श्रीहरि बाबा जी महाराज

परम पूज्य श्रीहरि बाबा जी महाराज

✨ वृंदावन आगमन और प्रेम-तत्त्व की जिज्ञासा

आज से लगभग २५ वर्ष पहले जब कि मैं कैलाश आश्रम ऋषिकेश से वृंदावन आया ही था, तभी गौर कांति युक्त काषाय वस्त्र धारी पूज्यपाद श्री हरि बाबा जी महाराज की अपूर्व मनोहर मूर्ति का दर्शन हुआ। साधक जीवन के सर्वस्व स्वरूप श्री बाबा जी की अभूतपूर्व दिनचर्या तथा अविराम निगूढ़ भावाविष्ट स्थिति सहज ही मन-प्राण को आपकी ओर विवश कर रही थी। मन में यही आया कि प्रेम तत्व का इससे अधिक अच्छा साकार दर्शन और कहां हो सकता है, परंतु मन अपने इसी स्वाभाविक हठ पर अड़ा रहा कि इनके श्री मुख से ही प्रेम तत्व सुनना है।

एक दिन सत्संग प्रसंग में मैंने पूछा— “बाबा! प्रेम वस्तु क्या है?” बस अब और क्या था, यह पूछना विलक्षण अनुभव का कारण हुआ। एकाएक आप हंस पड़े, कुछ बोले नहीं और बात उस समय वहीं की वहीं रह गई।

यमुना तट पर गोपी-भाव का अलौकिक दर्शन

इन दिनों मैं प्रायः घंटों यमुना जी के किनारे पर बैठकर ध्यान किया करता था। अब उस दिन ध्यान में क्या देखता हूं कि असंख्य गोपियां एकत्रित होकर बैठी हैं, वहां ही कुछ दूर श्री कृष्ण भी एकाकी बैठे हुए हैं। गोपियां सुंदर माला गूँथने में तत्पर हैं। मेरे मन में आया कि निश्चय ही ये माला गूँथ कर श्रीकृष्ण को ही पहनाएंगी, परंतु आश्चर्य की बात यह हुई कि सब ने अपनी-अपनी माला गूँथकर स्वयं ही धारण कर ली!

तब मैंने सखियों से पूछा— “ऐसा क्यों?” वे मुस्कुराकर बोलीं— ””श्रीकृष्ण को माला पहनाने से हमारी आंखों को ही तृप्ति मिलती है, परंतु जब हम माला पहनती हैं तो हमारे प्यारे मनमोहन की आंखों को परम तृप्ति मिलती है।”” वस्तुतः इसी का नाम तो सच्चा प्रेम है।

मेरे कहने पर एक गोपी ने भगवान को भी माला धारण करवाई। इसके अनंतर क्या देखता हूं कि सभी गोपियां पंक्तिबद्ध शनैः-शनैः मण्डलाकार होकर बैठ गई हैं। बीच में डलिया भर के अनेक प्रकार के सुस्वादु फल रखे हुए हैं। वे उन्हें अमनिया (प्रभु को अर्पित) करके परस्पर एक दूसरे को और प्यारे श्री कृष्ण को खिला रही हैं; अपने हाथ से स्वयं कोई नहीं खा रही, और श्रीकृष्ण भी अपने हाथ से नहीं लेते, वे गोपियों को खिला रहे हैं। मैंने आनंदित होकर पूछा— “यह कैसी लीला?” तो पुनः वही उत्तर मिला— “इसी का नाम तो प्रेम है।”

तेजोमय प्रकाश और स्वप्न में मैल की शुद्धि

इस अद्भुत लीला को देखकर मेरे आनंद मिश्रित आश्चर्य का ठिकाना ही न रहा। जब मैं अति निकट से यह लीला देखने गया तो क्या देखता हूं कि सब के स्थान पर अति आनंददायक दिव्य तेजोमय प्रकाश युक्त एकमात्र श्री हरि बाबा जी महाराज ही विराजमान हैं! इस दिव्य चरित्र से मन में अपार आनंद हुआ, मेरे प्रश्न का उत्तर मिल चुका था। क्या ही स्पष्ट और अपूर्व दर्शन था। हृदय बाध्य करता था कि श्री बाबा से इस विषय में पूछूँ, परंतु श्री बाबा की अनोखी संकोचता देखकर मन मसोसकर रह जाता था।

धीरे-धीरे समय बीतने पर एक दिन की बात है कि शीतकाल होने के कारण मैं अंदर बिस्तर में यथेष्ट कपड़ादि के साथ सो रहा था। स्वप्न में क्या देखता हूं कि पूजनीय श्री मां, श्री बाबा के दर्शनों के वास्ते प्रतीक्षा कर रही हैं। इतने में ही श्री बाबा, राम स्वरूप ब्रह्मचारी का हाथ पकड़े धीरे-धीरे नीचे आए और हमें देखकर आपने कहा— “आत्मानंद! तुम्हारे अंदर बहुत मैल भरा है, मैं सब साफ कर देता हूं।” यह कह कर आप बड़ी तीखी दृष्टि से मेरी ओर देखने लगे। मैं तो घबरा ही गया और देखते ही देखते मुझे उल्टी पर उल्टी होने लगी और उल्टी भी काली, पीली, नीली कई रंगों की!

✨ साक्षात् जाग्रत अवस्था में सत्य की सिद्धि

इससे मेरे शरीर में अजीब सा रोमांच होने लगा और घबराहट में नींद भी खुल गई। तो प्रत्यक्ष में क्या देखता हूं कि सचमुच उल्टी से मेरे सारे वस्त्र और बिस्तर सने हुए हैं! तब मैंने अपने साथी सदानंद को जगाया और उसकी मदद से सब साफ किया।

प्रातः कालीन बेला में जब श्री श्री महाराज जी, श्री ठाकुर जी का प्रचार कर रहे थे, मैंने जाकर आपको साष्टांग प्रणाम किया। मुझे देखते ही श्री महाराज जी ने चरण छोड़ कर मेरा हाथ पकड़ लिया और मुझे सीधा ऊपर ले गए। ऊपर जाकर ब्रह्मचारी से कहा कि— “इनके वस्त्र गंदे हो गए हैं, इन्हें नए वस्त्र और प्रसाद दो।”

यह देखकर मैं अवाक रह गया कि श्री महाराज जी को रात के स्वप्न व उल्टी के विषय में सब कुछ ज्ञात है! मेरा रहा-सहा संदेह भी हमेशा के लिए जाता रहा तथा मैंने दृढ़ता से उनके चरण पकड़ लिए और रोते हुए कहने लगा— “श्रीमहाराज जी! अब मुझे इन भौतिक पदार्थों में न भुलाओ, आपका यह भौतिक प्रसाद तो मुझे जन्म-जन्म से ही बहुत प्राप्त है। अब तो आपने रात्रि में जो दिव्य लीला कर दिखाई है, उसे सत्य करो।” मेरी दोनों आँखों से अविरल प्रेमाश्रु गिरनें लगे। तब आप मधुर मुस्कान हंसनें लगे और वहाँ से जाने को उद्यत हुए, परंतु मेरा अनन्य हठ देखकर आपने मुझे जो कुछ गुप्त आज्ञा दी, वही आज मेरे जीवन का एकमात्र परम आधार बनकर रह गई है।

“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥”