मन का त्राण करने वाला मंत्र क्या है? जानिए माँ आनंदमयी के साक्षात दिव्य उत्तर

दिव्य प्रसंग

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— परम पूज्य माँ आनंदमयी के साथ पावन प्रश्नोत्तर —

प्रश्न : आपत्ति को दूर करने का क्या उपाय है ?

गुरु का उपदेश सुनो, इससे जो नष्ट होनेवाला है उसका नाश हो जायेगा और जो नष्ट होनेवाला नहीं है वह भगवत्तत्त्व प्रकाशित हो जायेगा ।

प्रश्न : गुरु-सेवा क्या है ?

बिना विचारे गुरु के आदेश का पालन करना ।

प्रश्न : गुरु का आश्रय लिये बिना क्या साधन नहीं होता है ?

तुम्हारा प्रश्न और इस शरीर का उत्तर ही तो प्रमाण है कि तुम गुरु के निकट ही जिज्ञासु हो ।

प्रश्न : मंत्र किसको कहते हैं और ब्रह्मविद्या क्या है ?

मन का जो त्राण करता है उसीको ‘मंत्र’ कहते हैं । गुरुजी ने जो मंत्र दिया है जब तक उसका प्रकाश न हो, तब तक नियमित रूप से साधन-भजन करना चाहिए । जिस विद्या से अविद्या का नाश होता है उसे ‘ब्रह्मविद्या’ कहते हैं । यह विद्या जीवन के पथ को प्रकाशित करती है । ब्रह्मविद्या के प्रकाशित होने के लिए ही गुरुजी मंत्रोपदेश देते हैं ।

प्रश्न : किस अर्थ में गुरुदेव हमारे साथ हैं ?

यह बात अनेक अर्थों में बतायी जा सकती है । अखण्ड भाव से देखो तो गुरुदेव विश्वब्रह्माण्ड के अणु-अणु में व्याप्त हैं – इस अर्थ में वे तुम्हारे साथ हैं । विचार करने पर देखा जाता है कि जगत में एक ही सत् वस्तु है, वही गुरु और वही शिष्य है – इस अर्थ में गुरु तुम्हारे साथ हैं । इसके अलावा मंत्ररूप में गुरु तुम्हारे साथ हैं और विषय को खण्डरूप में देखने पर योगीगण योग के जरिये एक ही समय अनेक जगह रह सकते हैं । शिष्य के मंगल के लिए गुरु योगशक्ति के जरिये खण्डरूप में सभी शिष्यों के साथ सर्वदा रह सकते हैं ।

📜 अमृत निष्कर्ष
“मन का जो त्राण करता है, वही मंत्र है।”
जिस विद्या से समस्त अविद्या का नाश हो, साक्षात वही ब्रह्मविद्या है॥

  • कल्याण का मार्ग: गुरु का उपदेश सुनने से नष्ट होने वाले सांसारिक भ्रम मिट जाते हैं और अविनाशी भगवत्तत्त्व का स्वतः प्रकाश होता है।
  • आदर्श शिष्यत्व: बिना किसी संशय या तर्क-वितर्क के, पूर्ण शरणागति के साथ गुरुदेव के आदेश का पालन करना ही सच्ची गुरु-सेवा है।
  • सर्वव्यापी गुरु सत्ता: गुरुदेव विश्वब्रह्माण्ड के कण-कण में व्याप्त हैं और अपनी अलौकिक योगशक्ति द्वारा शिष्यों के कल्याण हेतु सदैव उनके साथ रहते हैं।

“हरि बोल हरि बोल हरि बोल संकीर्तन रस पीजै”