श्री हरिबाबा जी महाराज का पावन होशियारपुर आश्रम
पंजाब का होशियारपुर जिला परम पूज्य श्री हरिबाबा जी महाराज की मूल दीक्षा भूमि और उनके प्रारंभिक वैराग्य काल का साक्षी है। यहीं पर महाराज जी ने अपने आराध्य गुरुदेव के सानिध्य में योग, वेदांत और सेवा की कठिन साधना की थी। होशियारपुर स्थित आश्रम आज भी बाबा के भक्तों के लिए एक परम पवित्र और ऊर्जावान आध्यात्मिक केंद्र माना जाता है।
गुरु सानिध्य और दीक्षा स्थल का इतिहास
होशियारपुर बाबा जी का वह पावन तपस्या स्थल है जहाँ आपको अपने पूज्य गुरुदेव श्री स्वामी सच्चिदानंद जी महाराज का दिव्य सानिध्य प्राप्त हुआ था। लाहौर से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात जब बाबा के मन में वैराग्य की तीव्र पुकार उठी, तब उन्होंने होशियारपुर में गुरुदेव के चरणों में शरण ली और संन्यास मार्ग पर कदम रखा।
इसी आश्रम की पवित्र छांव में बाबा ने गुरुदेव की निष्काम भाव से सेवा की और अष्टांग योग व शास्त्रों का गूढ़ ज्ञान अर्जित किया। गुरुदेव श्री स्वामी सच्चिदानंद जी ने बाबा की विरक्ति और सेवा भावना से प्रसन्न होकर उन्हें लोक कल्याण और अखंड हरिनाम संकीर्तन के प्रचार-प्रसार की आज्ञा देकर विदा किया था।
पावन आश्रम एवं गुरुदेव स्मृति दर्शन
होशियारपुर की यह भूमि आज भी बाबा के प्रारंभिक वैराग्य और गुरु-शिष्य परंपरा की अनूठी सुगंध से महक रही है।


होशियारपुर आश्रम की मुख्य आध्यात्मिक कड़ियाँ
इस पावन आश्रम के इतिहास और साधना काल से जुड़े कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य निम्नलिखित हैं:
- तीर्थ राम से हरिबाबा की यात्रा: इसी आश्रम में बाबा के बचपन का नाम ‘तीर्थ राम’ बदलकर विरक्त संन्यासी के रूप में स्थापित हुआ। गुरुदेव के दिए संस्कारों के कारण ही वे आगे चलकर ‘हरिबाबा’ कहलाए।
- कठिन योग साधना का केंद्र: उत्तर प्रदेश के खादर क्षेत्र (गन्धोवाल) में आने से पहले बाबा ने कई वर्षों तक इसी आश्रम के एकांत में मौन रहकर प्राणायाम, ध्यान और अखंड हरिस्मरण का अभ्यास किया था।
- गुरु सेवा की पराकाष्ठा: आश्रम की परंपराओं के अनुसार, बाबा जी ने यहाँ पानी भरने, रसोई संभालने और आश्रम की सफाई करने जैसे साधारण सेवा कार्यों को अत्यंत प्रसन्नता और निष्काम भाव से किया था।
- अखंड प्रेरणा पुंज: यद्यपि बाबा जी ने अपना अधिकांश लीला काल उत्तर प्रदेश के गंगा तट खादर में बिताया, परंतु उनके मन में होशियारपुर आश्रम और अपने गुरुदेव के प्रति अगाध श्रद्धा सदा बनी रही, जिसका उल्लेख उनके संस्मरणों में मिलता है।
पंजाब की तपस्या से खादर की सेवा तक
होशियारपुर आश्रम बाबा जी के जीवन का वह आधार स्तंभ है जहाँ उन्होंने आंतरिक ऊर्जा का संचय किया। इसी ऊर्जा और गुरु-कृपा के बल पर उन्होंने कलयुग में ‘हरि बांध’ के निर्माण जैसी असंभव और अलौकिक लीला को साकार कर दिखाया। मान्यता है कि जो भी भक्त बाबा जी की इस प्रारंभिक तपस्थली का दर्शन करता है, उसके भीतर गुरु-भक्ति और वैराग्य के संस्कार स्वतः जाग्रत होने लगते हैं।
श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः। जय जय हरि बन्धा बासी।
