परम पूज्य बाबा श्रीहरेकृष्ण जी महाराज को समर्पित श्रद्धा-सुमन

◆ ❖ ◆

हरि भक्तों द्वारा अर्पित पावन संस्मरण एवं पुष्पांजलि

ज्य बाबा जी, आपके दिव्य सान्निध्य और अमूल्य उद्देश्यों ने असंख्य लोगों के जीवन को नई दिशा प्रदान की। आपने सदा ही जीवों को सत्य, सादगी, सेवा, प्रेम, करुणा, अनुशासन, आत्मसंयम तथा ईश्वर-भक्ति का मार्ग अपनाने के लिए प्रेरित किया। आपके द्वारा बताए गए जीवन के नियम और सिद्धांत केवल सुनने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें अपने आचरण में उतारने के लिए हैं। आपने सिखाया कि मनुष्य अपने कर्मों से महान बनता है। जीवन में विनम्रता, धैर्य, परोपकार और सदाचार का पालन करना ही वास्तविक धर्म है।

परम पूज्य श्रीहरि बाबा जी महाराज

परम पूज्य बाबा श्रीहरेकृष्ण जी

विचार, आदर्श और आशीर्वाद सदा जीवित रहेंगे

प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्तव्य का निष्ठापूर्वक पालन करते हुए मानवता और सेवा को सर्वोच्च स्थान देना चाहिए। आज आपका भौतिक स्वरूप हमारे मध्य नहीं है, किन्तु आपके विचार, आदर्श, संस्कार और आशीर्वाद हमारे हृदय में सदा जीवित रहेंगे। हम सभी संकल्प लेते हैं कि आपके बताये हुए नियमों और सिद्धांतों का पालन करते हुए अपना जीवन सार्थक बनायेंगे और समाज में प्रेम, सद्भाव तथा सेवा की भावना को आगे बढ़ायेंगे। यही आपके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धा और श्रद्धांजलि होगी। ईश्वर से प्रार्थना है कि हमें आपके आदर्शों पर चलने की शक्ति, विवेक और सद्बुद्धि प्रदान करें। ॐ शांति, शांति, शांति।

— अंजू रस्तोगी

अद्वितीय महापुरुष और धैर्यवान साधक

श्रीहरेकृष्ण जी एक अद्वितीय महापुरुष थे। वे बचपन से ही सत्य की खोज में वृन्दावन आ गए थे। उन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन किया और पूर्णतः संयमी रहे। श्रीहरिबाबा जी की शरण में आने के बाद उन्होंने पूरी निष्ठा से सेवा की। वे पाकशास्त्र, सिलाई-कढ़ाई आदि कलाओं में पूर्ण निपुण थे। मन्दिर और आश्रम सजाने में उनकी गुणवत्ता उत्तम थी। उनका आदर्श व्यक्तित्व एक उदाहरण है। वे हर समय हरि-भजन में लीन रहे और अंत समय तक बड़े धैर्यवान रहे।

मैं सुखदेव गुप्ता मोहाली से उनके सम्पर्क में श्रीप्रेमचन्द वालिया और इन्द्र सिंह वालिया के माध्यम से आया था और हम सभी हमेशा उनके प्रेम के पात्र बने रहे। हमें उनसे हरि-महिमा और धैर्य की प्रेरणा मिली। हर समय उनकी प्रेम भरी छवि आँखों में समाई रहेगी। ॐ शांति शांति शांति।

— सुखदेव गुप्ता (मोहाली, चंडीगढ़)

“महाराज जी की पवित्र आत्मा को मेरा कोटि-कोटि प्रणाम।
आप हमेशा हमारे जीवन के मार्ग-दर्शक रहे। समय-समय पर आपने अपने विचारों और वाणी से हमें प्रोत्साहित किया और कठिन परिस्थितियों को हमारे लिए सरल बना दिया।”

मानवता की सेवा में समर्पित जीवन

आपकी सीख हमारे जीवन का सबसे अनमोल उपहार है। आपका सम्पूर्ण जीवन समाज और मानवता की सेवा में समर्पित रहा। ईश्वर से प्रार्थना है कि वह दिवंगत आत्मा को श्रीचरणों में अनन्त शान्ति प्रदान करें और हम सबको आपके दिखाये हुए मार्ग पर चलने की शक्ति दें। आपका आदर्श और शिक्षाएं हमेशा हमारे दिलों में जीवित रहें। विनम्र श्रद्धांजलि।

— अनीता वालिया (पत्नी स्व. राकेश वालिया, मोहाली, चंडीगढ़)

दिव्य प्रेरणा-स्रोत और जीवन की स्मृतियाँ

श्रीहरेकृष्ण बाबा को मेरा कोटि-कोटि प्रणाम। बाबा शारीरिक रूप से आज हमारे मध्य नहीं हैं पर आपके द्वारा दी गई शिक्षाएं और श्रीबाँध धाम, श्रीवृन्दावन धाम, होशियारपुर, गढ़वाल में हमारे लिए आपने जो भी अद्भुत कार्य किए वे सब प्रेरणा-स्रोत रहेंगे। बचपन से ही बाबा चंडीगढ़ में श्रीरामस्वरूप जी ब्रह्मचारी जी व पूज्य निगमबोध तीर्थ जी के साथ हमें दर्शन देते रहे। और महाराज जी के जीवन-चरित्र के साथ जुड़ी घटनाओं से हमें उन पर आचरण करने के लिए प्रेरणा देते रहते थे। बाबा अब हमारे मध्य भौतिक रूप में नहीं हैं किन्तु अब भी उनके जीवन के आदर्श पहले की ही भाँति आज भी हमारा मार्ग-दर्शन करते रहेंगे।

— सुमन अग्रवाल (पत्नी स्व. शैलेन्द्र अग्रवाल, गवां)

“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥”

परम पूज्य बाबा श्रीहरेकृष्ण जी महाराज को समर्पित श्रद्धा-सुमन

◆ ❖ ◆

श्रीचैतन्य महाप्रभु अवतार रहस्य, बाँध धाम महिमा एवं शताब्दी जन्मोत्सव संस्मरण

रम पूज्य सन्त शिरोमणि श्री श्री १००८ श्रीहरि बाबा जी महाराज वास्तव में इस लौकिक जगत की पारलौकिक आभा हैं, जिनके नाम, गुण, धर्म से भक्ति, शरणागत भाव प्रफुल्लित हो निरंतर अविरल प्रकट होते रहते हैं। कलिकाल में श्रीचैतन्य महाप्रभु जी ने नाम संकीर्तन का दिव्य शंखनाद किया था, उसी भावावेश में श्रीहरि बाबा जी का प्राकट्य भी नाम की महिमा का उद्घोष करने और जन-जन को भगवद्भाव से जोड़ने के लिए हुआ। इसी कारण श्रीहरिबाबाजी महाराज को श्रीचैतन्य महाप्रभु जी का अवतार भी माना जाता है।

परम पूज्य श्रीहरि बाबा जी महाराज

परम पूज्य श्रीहरि बाबा जी महाराज

असाध्य रोगों को दूर करने वाला नाम संकीर्तन

श्रीमहाप्रभु जी की नित्य संकीर्तन की अविरल धारा एवं जन-जन तक श्रीहरिनाम पहुँचाने का उद्देश्य ही उन्हें धीरे-धीरे हरि बाबा के नाम से प्रसिद्ध करता चला गया। श्रीमहाराज जी तीव्र वेग से घण्टा बजाते हुए नाम के उद्घोष का अखण्ड स्वरूप साधते तो असाध्य से असाध्य रोग, पीड़ा, भय दूर हो जाते थे। साथ ही मानव कल्याण के लिए जटिल से सरल उठाया गया बीड़ा भी सफलतापूर्वक पूर्ण होता और सिद्ध हो जाता, इसका साक्षात स्वरूप विराजमान है— अखण्ड संकीर्तन के चलते बाँध धाम का निर्माण जो प्रत्यक्ष रूप से नाम की महिमा को दर्शाता है।

श्रीहरि बाबा जी के दो मुख्य आधार स्तंभ

ब्रह्मलीन श्रीरामस्वरूप ब्रह्मचारी बाबा एवं ब्रह्मलीन बाबा श्रीहरिकृष्ण ब्रह्मचारी जी, श्रीहरिबाबा जी के दीक्षा को ग्रहण करने वाले, उनकी शरण में रहने वाले उनके शिष्य स्वरूप दिव्य विभूतियाँ थीं। दोनों ही महाराज जी के जीवन-काल में तन्मयता से उनकी सेवा में रहते थे। श्रीहरि बाबा जी महाराज जब सशरीर विद्यमान थे, तब पूज्य श्रीरामस्वरूप ब्रह्मचारी बाबा दैनिक दिनचर्या को संभालते और वहीं बाबा हरिकृष्ण जी व्यवस्थाओं को बखूबी संभालते हुए प्रतिपल-प्रतिक्षण श्रीहरि बाबा जी के मनोभावों को समझते हुए अपने गुरु की आज्ञा का पालन कर एकनिष्ठ हो सेवा में रहते थे।

ब्रह्मलीन बाबा श्रीहरेकृष्ण ब्रह्मचारी जी श्रीहरिबाबा जी महाराज के ज्ञान, वैराग्य, तप के असंख्य ज्योतिषपुंजों को धारण किए इस धरा पर देदीप्यमान थे। उनकी शान्त-तपस्वी आभा, सरल स्वभाव, गुणनिरपेक्ष एवं नामनिष्ठ आचरण श्रीमहाराज जी की उपस्थिति का आभास कराता रहता था। श्रीमहाराज जी के गोलोकगमन के बाद भी श्रीहरेकृष्ण बाबा कृष्ण-प्रसाद हम हरि-भक्तों में ऐसे लुटाते थे कि मानो साक्षात श्रीमहाराज जी विराजमान हों।

कर्तव्य-पथ पर महाराज जी का अखंड ध्यान

बाँध पर कोई भी उत्सव, लीला हो, वृन्दावन में महाराज जी का जन्मोत्सव हो, पूज्य श्रीहरेकृष्ण बाबा उसे पूर्ण उत्साह, पूर्ण दृढ़संकल्प भाव से एक-एक व्यवस्था को देखते थे मानो साक्षात महाराज जी ही विराजमान हों। अक्सर सांसारिक भक्त समस्याओं को लेकर बाबा के पास आते तो बाबा बड़े सरल शब्दों में उनके उत्तर देते कहते— अपने कर्तव्य-पथ पर महाराज जी का ध्यान करते हुए आगे बढ़ते रहो। सही-गलत, लाभ-हानि सब श्रीमहाराज जी पर छोड़ दो। बस महाराज जी का नाम लेते हुए आगे बढ़ो।

— दिनेशचन्द्र शास्त्री

शताब्दी जन्मोत्सव पर साक्षात् कृपा की साक्ष्य गाथा

यह घटना महाराज जी के शताब्दी जन्मोत्सव की है। मेरी बहुत इच्छा थी, महाराज जी के जन्मोत्सव में पहुँचने की, पर शारीरिक दुर्बलता के चलते एवं पैरों की जटिल समस्या के कारण मेरा पहुँचना सम्भव नहीं था। उत्सव का दिन पास आता जा रहा था। अचानक से दो दिन पहले व्याकुलता बढ़ी, एक तीव्र वेग जागृत हुआ और मैंने कहा— “नहीं, मुझे तो चलना ही है।” और मैं बाँध पहुँच गई। हरेकृष्ण बाबा जी को जैसे ही पता लगा कि इतनी अस्वस्थ अवस्था में भी नन्दिनी आ गई है तो वह मुझसे मिलने स्वयं चले आये।

जैसे ही मैंने बाबा को देखा, मेरे आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। बाबा ने मेरा सिर थपथपाया। मैंने बाबा से कहा— “मैं तो आ गई बाबा।” बाबा मुस्कुराए और बोले— “तू नहीं आई, तुझे बुलाया गया है।” महाराज जी ने बुलाया है। अगर तेरी चलाती तो तू आ नहीं पाती परंतु उनकी मर्जी के चलते तू कैसे रुक पाती? इन भाइयों को रोकने वाले, इन शरणागत भक्तों को देने वाले हमारे परम पूज्य श्रीहरेकृष्ण बाबा ही थे। भक्ति मार्ग पर भक्तों की उंगली पकड़कर आगे ले जाने वाली भावना से भरा था उनका वात्सल्य हृदय।

बाबा ने इतनी सहजता से महायज्ञ जी के कृपा-प्रसाद को बताते हुए मेरी समस्त दुविधाओं और अस्वस्थता को सहज कर दिया। ऐसे दिव्य प्रतापी हमारे बाबा के पावन चरणों में, मैं नन्दिनी, बाबा को शत-शत नमन कर अपना श्रद्धा-सुमन अर्पित करती हूँ।

— नन्दिनी (कानपुर)

“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥”