नामावतार दिव्य स्वरूप पूज्य महाराज जी – हरि बाबा जी
परम पूज्य श्रीहरि बाबा जी महाराज और अनंत श्री विभूषित श्री उड़िया बाबा जी महाराज का प्राकट्य इस धरा पर जन-कल्याण और भक्ति-ज्ञान के प्रचार के लिए हुआ था। ये दोनों महापुरुष समकालीन युग के साक्षात् शिव और हरि के रूप माने जाते थे। जहाँ एक ओर श्री उड़िया बाबा जी महाराज अद्वैत वेदांत के साक्षात् विग्रह थे, वहीं दूसरी ओर श्रीहरि बाबा जी महाराज साक्षात् संकीर्तन और अखंड सेवा के अवतार थे। इन दोनों महापुरुषों का जीवन चरित्र आज भी काफ़ी प्रेरणादायक है।

पूज्य श्रीहरि बाबा जी महाराज

पूज्य श्री उड़िया बाबा जी महाराज
कलयुग नाम अधारा, सुमिर सुमिर उत्तरहि पारा।
कलियुग में नाम की महिमा को जन चेतना से जोड़ने वाले परम पूज्य श्री श्री 1008 हरि बाबा जी की महिमा का विस्तार परम पूज्य श्री श्री 1008 उड़िया बाबा जी महाराज के स्मरण और आशीर्वाद के बिना मानो ऐसा प्रतीत होगा जैसे शब्द तो हैं पर अभिव्यक्ति नहीं है।
सर्वप्रथम मैं स्वाति, बाबा के श्रीचरणों में प्रणाम करती हूँ और श्री महाराज जी से वह बल मांगती हूँ कि अपनी लेखनी से आप दोनों की महिमा की झांकी यहां प्रस्तुत कर सकूं।
मैंने अपने इस जीवन में श्री बाबा (उडिया बाबा जी )और श्री महाराज जी(हरिबाबाजी )के बारे में अपनी मां नंदिनी और नाना जी श्री गिरीश बाबू मोडवेल (इटावा) से सुना, समझा और मन में धारण किया है। वे बताते थे कि महाराज जी और बाबा एक मन के दो स्वरूप थे। एक स्वरूप सिद्ध है तो दूसरा स्वरूप साध्य है।
पूज्य उड़िया बाबा जी महाराज और पूज्य श्री हरि बाबा जी महाराज, मानो दो सशरीर विभक्त जरूर थे, पर आत्मिक रूप से अभिवक्त थे।
आप दोनों के बीच किसी भी चीज की कोई गुन्जाईश नहीं थी। यहां तक कि समवाद भी आप दोनों के बीच नहीं आ सकता था। बिना कुछ कहे आप एक-दूसरे की बात समझ लिया करते थे। इसलिए यदा-कदा ही, बाबा और श्री महाराज का समवाद सुनने को मिलता था
परम पूज्य श्री उडिया बाबा जी की अनंत लीलाओं में से एक प्राकट्य लीला जो दर्शाती है उनका स्नेहवत भाव श्री हरि बाबा जी महाराज के प्रति
यह बात तब की है जब श्री चैतन महाप्रभुजी का जन्म उत्सव बड़ी धूमधाम से बांध धाम पे मनाने की तैयारिया वृंदावन में हो रही थीं। पूज्य श्री महाराज जी( हरि बाबा जी महाराज) का मन था कि पूज्य बाबा भी बांध धाम पर उत्सव में विराजमान रहे, पर समय के अभाव के कारण बिना वाहन बाँध पहुंचना संभव न था और बाबा ने तो जीवन भर वाहन पर सवारी ना करने की प्रतिज्ञा धारण कर रखी थी। पर भक्तवत्सल हृदय पिता तुल्य श्री बाबा महाराज जी के इस अनुरोध, इस इच्छा को रखते हुए बांध पर पहुँच गए वाहन से और एक दिन पहले ही महाराज जी से बाबा वहां विराजमान हो गए। श्री महाराज जी के एक अनुग्रह को पूर्ण करने के लिए बाबा ने अपने जीवन भर की प्रतिज्ञा को भी छोड़ दिया।
ऐसा संबंध था पिता-पुत्र का, बाबा और श्री महाराज जी के साथ बांध पर श्री चैतन्य महाप्रभु जी का उत्सव बहुत दिव्यता से हुआ, जहां अनेक संत विराजमान हुए। श्री उड़ीया बाबा जी ने पुत्र स्वरूप श्री हरि बाबा जी की इच्छा पूर्ण करने और वहां के विशाल उत्सव और जनकल्याण हेतु अपनी प्रतिज्ञा तक को छोड़ दिया और मोटर कार मंगवाकर श्री महाराज जी से एक दिन पहले ही बांध पहुंच गए। मां आनंदमयी और अनेक संत शिरोमणि बांध पर पधारे और बड़ी धूमधाम से चैतन्य महाप्रभु जी का जन्मोत्सव मनाया गया। ऐसे महाराज जी और श्री बाबा के बीज का अनुग्रह स्वयं महाराज जी (श्री हरि बाबा जी महाराज) बाबा के प्रति अपने संस्मरण में व्यक्त किया है।
श्री हरि बाबा जी का संस्मरण
परम पूज्य श्री हरि बाबा जी महाराज एक संस्मरण में कहते हैं कि, बाबा साक्षात प्रेम की मूर्ति थे। मुझे तो स्पष्ट दिखता था कि बाबा मुझे कितना प्रेम करते हैं। शायद उतना तो विश्व में किसी और ने किसी से नहीं किया।
बाबा और मुझमें संकोचवश कुछ खुलकर बात नहीं होती थी। यदा-कदा एक-दो बार ही ऐसा अवसर आया जब हमारे बीच संवाद स्थापित हुआ, जब हम दोनों में थोड़ा बात हुई। कई बार घंटा बजता तो बाबा कहते, “अरे चलो हरि बाबा कीर्तन में पहुंच गए होंगे,” और स्वयं भी शीघ्रता से वहां से चल देते। इस तरह से बाबा और मुझमें एक अटूट सा स्नेह बंधन था।
श्री महाराज जी इसी संस्मरण में आगे बताते हैं। श्री महाराज जी कहते हैं: प्रारंभ में जब मैं बांध के समीपवर्ती गांवों में संकीर्तन करने लगा तो गंगा तट पर रहने वाले जितने ज्ञाननिष्ठ संत थे, प्रायः उन सभी ने संकीर्तन का विरोध किया। कहने लगे, संन्यासी होकर कीर्तन में नाचते हो। एक बाबा ही थे जिन्होंने सच्चे हृदय से हरिनाम संकीर्तन का समर्थन किया और केवल मौखिक समर्थन ही नहीं अपितु जीवन भर स्वयं भी उसका प्रचार करते रहे। यदि बाबा न होते तो यह संकीर्तन प्रचार कभी बंद हो गया होता। मेरे मन में कई बार संकीर्तन सेवाओं को बंद करने की इच्छा आई पर बाबा सदैव प्रोत्साहन देते रहे। वे कहा करते थे, “हम तो महोत्सव करना है, हमें तो महोत्सव करना है। दूसरे क्या कहते हैं यह देखना नहीं।”
लोगों का विरोध यहीं तक नहीं था। संकीर्तन के प्रारंभ में ओमकार ध्वनि के प्रश्न को लेकर बड़ा आंदोलन चला। श्री करपात्री जी आदि महात्माओं ने इसका विरोध किया और मेरे पास समाचार भेजा। परंतु बाबा ने स्पष्ट कह दिया, “हरि बाबा महात्मा है। वे जो करते हैं, ठीक ही करते हैं।” उसमें कुछ भी अनुचित नहीं है। कभी-कभी ऐसा भी हुआ कि कथा कहते समय मैं ऐसा अर्थ कर देता जो टीकाकारों के अर्थ से भिन्न होता। परंतु बाबा कहते नहीं। हरि बाबा जो अर्थ करते हैं, वही ठीक है। बाबा ने ही ललिता प्रसाद जी को प्रोत्साहन देकर मेरा जीवन चरित्र लिखवाया। जब वह लिखने में अपनी असमर्थता प्रकट करते तो वह कहते नहीं: रे तू तो लिखेगा, वही ठीक होगा। मैंने कभी अपने को बाबा के बराबर आसन पर बैठने योग्य नहीं समझा। मुझे सदैव इस बात में संकोच होता था। परंतु यदि मैं उनके बराबर आसन पर नहीं बैठता था तो वे उदास हो जाते थे। इससे उनकी प्रसन्नता के लिए मुझे भी आसन पर बैठना पड़ता था। इस तरह की अनेक लीलाएं महाराज जी श्री हरि बाबा जी के संस्मरणों में उपस्थित हैं और यह दिव्य लीलाएं ही प्रदर्शित करती हैं कि बाबा और श्री महाराज जी आत्मिक रूप से एक ही स्वरूप थे।
