श्री चैतन्य महाप्रभु जी का पावन जीवन चरित्र एवं दिव्य गाथा
महाप्रभु (१८ फरवरी, १४८६-१५३४) वैष्णव धर्म के भक्ति योग के परम प्रचारक एवं भक्तिकाल के प्रमुख कवियों में से एक हैं। इन्होंने वैष्णवों के गौड़ीय संप्रदाय की आधारशिला रखी, भजन गायकी की एक नयी शैली को जन्म दिया तथा राजनैतिक अस्थिरता के दिनों में हिंदू-मुस्लिम एकता की सद्भावना को बल दिया, जाति-पांत, ऊंच-नीच की भावना को दूर करने की शिक्षा दी तथा विलुप्त वृंदावन को फिर से बसाया और अपने जीवन का अंतिम भाग वहीं व्यतीत किया। उनके द्वारा प्रारंभ किए गए महामंत्र नाम संकीर्तन का अत्यंत व्यापक व सकारात्मक प्रभाव आज पश्चिमी जगत तक में है।
श्री चैतन्य महाप्रभु प्रणाम मंत्र
श्री चैतन्य महाप्रभु को भगवान श्रीकृष्ण का साक्षात अवतार माना जाता है, जो इस कलयुग में जीव मात्र के कल्याण के लिए भक्तियोग और प्रेम-भक्ति का आदर्श स्वरूप लेकर प्रकट हुए। इस दिव्य मंत्र के माध्यम से उनकी असीम महिमा और करुणामयी स्वभाव की अत्यंत सुंदर स्तुति की गई है।
नमो महा-वदान्याय कृष्ण-प्रेम-प्रदायते ।
कृष्णाय कृष्ण-चैतन्य-नामने गौर-त्विषे नमः ॥
Namo Mahā-Vadānyāya Krishna-Prema-Pradāyate |
Krishnāya Krishna-Chaitanya-Nāmne Gaura-Tvishe Namah ||
नियमित मंत्र जाप के दिव्य लाभ
- इस मंत्र के नियमित स्मरण से साधक को शुद्ध श्रीकृष्ण-भक्ति का दिव्य मार्गदर्शन मिलता है।
- यह मानव ह्रदय में सोई हुई उच्चतम आध्यात्मिक चेतना को जागृत करता है।
- चित्त और मन को पूरी तरह शुद्ध करके अंतःकरण में परम प्रेम-भक्ति का संचार करता है।
- सांसारिक मोह-माया के बंधनों और पापों का नाश कर मोक्ष का परम द्वार खोलता है।
जन्म एवं प्राकट्य स्थल
- जन्म तिथि: १८ फरवरी १४८६ (फाल्गुन पूर्णिमा, चंद्र ग्रहण के पावन समय)
- जन्म स्थान: नवद्वीप (नादिया ज़िला), जिसे वर्तमान में मायापुर कहा जाता है, पश्चिम बंगाल।
बाल्यकाल के विविध नाम
- विश्वंभर: जन्मकुण्डली के आधार पर विद्वान ब्राह्मणों ने उनका नाम विश्वंभर रखा था।
- निमाई: नीम के वृक्ष के नीचे जन्म होने के कारण माता और सभी स्नेहवश उन्हें ‘निमाई’ कहकर पुकारते थे।
- गौरांग / गौर हरी: अत्यंत अलौकिक एवं कंचन जैसी सुनहरी कांति (गौर वर्ण) होने के कारण वे गौरांग कहलाए।

ज्योतिषियों की अमिट भविष्यवाणी
श्री निमाई के जन्म के समय उपस्थित शुभ शगुनों और ग्रहों की उच्च स्थिति को देखकर तत्कालीन प्रकांड विद्वान ब्राह्मणों ने उनकी जन्मकुण्डली का फलादेश करते हुए एक महान भविष्यवाणी की थी। उन्होंने कहा था कि “यह बालक कोई साधारण मनुष्य नहीं है, अपितु यह जीवन पर्यन्त संपूर्ण विश्व में हरिनाम का प्रचार-प्रसार करेगा और भटके हुए जीवों का कल्याण करेगा।”
विलक्षण प्रतिभा और अध्यापन लीला
- अल्पायु में विद्वता: चैतन्य महाप्रभु बचपन से ही अत्यंत विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने बहुत ही कम आयु में न्याय शास्त्र और संस्कृत व्याकरण में पूर्ण पारंगता हासिल कर ली थी।
- बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा संपन्न थे। साथ ही अत्यंत सरल, सुंदर व भावुक भी थे। इनके द्वारा की गई लीलाओं को देखकर हर कोई हतप्रभ हो जाता था। बहुत कम आयु में ही निमाई न्याय व व्याकरण में पारंगत हो गए थे। इन्होंने कुछ समय तक नादिया में स्कूल स्थापित करके अध्यापन कार्य भी किया। निमाई बाल्यावस्था से ही भगवद्चिंतन में लीन रहकर राम व कृष्ण का स्तुति गान करने लगे थे।
- चैतन्य महाप्रभु वैष्णव धर्म के भक्ति योग के परम प्रचारक एवं भक्तिकाल के प्रमुख कवियों में से एक हैं। इन्होंने वैष्णवों के गौड़ीय संप्रदाय की आधारशिला रखी, भजन गायकी की एक नयी शैली को जन्म दिया तथा राजनैतिक अस्थिरता के दिनों में भगवान कृष्ण की भक्ति को बल प्रदान किया।
- यह सोलह शब्दीय (३२ अक्षरीय) कीर्तन महामंत्र निमाई की ही देन है। इसे तारकब्रह्ममहामंत्र कहा गया, व कलियुग में जीवात्माओं के उद्धार हेतु प्रचारित किया गया था। जब ये कीर्तन करते थे, तो लगता था मानो ईश्वर का आह्वान कर रहे हैं। 1510 में संत प्रवर श्री पाद केशव भारती से संन्यास की दीक्षा लेने के बाद निमाई का नाम कृष्ण चैतन्य देव हो गया। मात्र 24 वर्ष की आयु में ही इन्होंने गृहस्थ आश्रम का त्याग कर सन्यास ग्रहण किया।बाद में ये चैतन्य महाप्रभु के नाम से प्रख्यात हुए।
- सन्यास लेने के बाद जब गौरांग पहली बार जगन्नाथ मंदिर पहुंचे, तब भगवान की मूर्ति देखकर ये इतने भाव-विभोर हो गए, कि उन्मत्त होकर नृत्य करने लगे, व मूर्छित हो गए।संयोग से तब वहां उपस्थित प्रकाण्ड पण्डित सार्वभौम भट्टाचार्य महाप्रभु की प्रेम-भक्ति से प्रभावित होकर उन्हें अपने घर ले गए। घर पर शास्त्र-चर्चा आरंभ हुई, जिसमें सार्वभौम अपने पाण्डित्य का प्रदर्शन करने लगे, तब श्रीगौरांग ने भक्ति का महत्त्व ज्ञान से कहीं ऊपर सिद्ध किया व उन्हें अपने षड्भुजरूपका दर्शन कराया। सार्वभौम तभी से गौरांग महाप्रभु के शिष्य हो गए और वह अन्त समय तक उनके साथ रहे। पंडित सार्वभौम भट्टाचार्य ने गौरांक की शत-श्लोकी स्तुति रची जिसे आज चैतन्य शतक नाम से जाना जाता है। उड़ीसा के सूर्यवंशी सम्राट, गजपति महाराज प्रताप रुद्रदेव ने इन्हें श्रीकृष्ण का अवतार माना और इनका अनन्य भक्त बन गया।
- चैतन्य महाप्रभु संन्यास लेने के बाद नीलांचल चले गए। इसके बाद दक्षिण भारत के श्रीरंग क्षेत्र व सेतु बंध आदि स्थानों पर भी रहे। इन्होंने देश के कोने-कोने में जाकर हरिनाम की महत्ता का प्रचार किया। सन १५१५ में विजयादशमी के दिन वृंदावन के लिए प्रस्थान किया। ये वन के रास्ते ही वृंदावन को चले। कहते हैं, कि इनके हरिनाम उच्चारण से उन्मत्त हो कर जंगल के जानवर भी इनके साथ नाचने लगते थे। बड़े बड़े जंगली जानवर जैसे शेर, बाघ और हाथी आदि भी इनके आगे नतमस्तक हो प्रेमभाव से नृत्य करते चलते थे। कार्तिक पूर्णिमा को ये वृंदावन पहुंचे। वृंदावन में आज भी कार्तिक पूर्णिमा के दिन गौरांग का आगमनोत्सव मनाया जाता है। यहां इन्होंने इमली तला और अक्रूर घाट पर निवास किया। वृंदावन में रहकर इन्होंने प्राचीन श्रीधाम वृंदावन की महत्ता प्रतिपादित कर लोगों की सुप्त भक्ति भावना को जागृत किया। यहां से फिर ये प्रयाग चले गए। इन्होंने काशी, हरिद्वार, शृंगेरी (कर्नाटक), कामकोटि पीठ (तमिलनाडु), द्वारिका, मथुरा आदि स्थानों पर रहकर भगवद्नाम संकीर्तन का प्रचार-प्रसार किया।
- चैतन्य महाप्रभु ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष जगन्नाथ पुरी में रहकर बिताएं। चैतन्य महाप्रभु का निधन 15 जून 1534 को जगन्नाथ पुरी में हुआ।

