संत चरित्र

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— मिथिला के सिद्ध एवं उच्च कोटि के रसिक संत मामा श्री प्रयागदास जी महाराज —


मामा श्री प्रयागदास जी महाराज
मामा श्री प्रयागदास जी महाराज

मामा श्री प्रयागदास जी मिथिला के एक अत्यंत सिद्ध और उच्च कोटि के रसिक संत थे। उनकी भावभूमि इतनी उन्नत और पवित्र थी कि वे सांसारिक बंधनों से पूरी तरह मुक्त थे। प्रभु के प्रति उनका प्रेम बहुत ही विलक्षण और आत्मीय था। वे माता जानकी (सीता जी) को अपनी सगी बड़ी बहन (जीजी) और मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम को अपना जीजा जी मानते थे। इसी पारिवारिक रिश्ते के कारण संत समाज और भक्तजन उन्हें सम्मान से ‘मामा’ कहकर पुकारते थे। भगवान को सगे रिश्तेदार की तरह भजने वाले मामा प्रयागदास जी का हृदय अत्यंत कोमल और संवेदनशील था।

मामा प्रयागदास जी का स्वभाव इतना भावुक था कि वे भगवान के कष्ट या विरह के प्रसंगों को कभी सहन नहीं कर पाते थे। एक बार वे एक संत के मुख से कथा सुन रहे थे। व्यास गद्दी पर बैठे वक्ता महानुभाव प्रयागदास जी के अति कोमल स्वभाव से भली-भांति परिचित थे। वे जानते थे कि जहां मामा जी बैठे हों, वहां भगवान के वनवास की कोई चर्चा नहीं करनी चाहिए। परंतु दैवयोग से उस दिन कथा के प्रवाह में व्यास जी ने भगवान श्रीराम और माता सीता के वनवास लीला का प्रसंग छेड़ दिया। उन्होंने वन के बीहड़ रास्तों और वहां की विषम परिस्थितियों का वर्णन कर दिया। वनवास की यह कठोर कथा सुनते ही प्रयागदास जी व्याकुल हो उठे।

वनवास का प्रसंग सुनकर प्रयागदास जी फूट-फूट कर रोने लगे। उनके मन में निरंतर यही विचार आ रहा था कि मेरी अत्यंत सुकुमारी जीजी (सीता जी) इतनी कोमल हैं, वे उस भयंकर जंगल में कैसे रह रही होंगी? मेरे जीजा जी (श्रीराम) तो परम सुकुमार और राजमहलों के सुखों में पले-बढ़े हैं, वे वन के कष्ट कैसे सह रहे होंगे? भयानक वन में जब उन्हें प्यास लगेगी, तो वे पानी कहां खोजेंगे? जब वे पैदल चलकर थक जाते होंगे, तो विश्राम कहां करते होंगे? वहां तो तमाम जीव-जंतु और कांटे-कंकड़ पड़े रहते हैं। ऐसे में मेरी जीजी और जीजा जी बिना गद्दे-बिस्तर के कैसे सोते होंगे? बहन और बहनोई का यह कष्ट सोचकर उनका वात्सल्य भाव अपने चरम पर पहुंच गया।

अपनी जीजी और जीजा जी के वनवास के कष्टों को दूर करने के लिए प्रयागदास जी ने तुरंत एक अनोखा संकल्प लिया। उन्होंने स्वयं अपने हाथों से एक सुंदर और मजबूत खाट (चारपाई) बुनी। उस खटिया पर उन्होंने बहुत ही मुलायम और आरामदायक ओढ़ना-बिछौना तैयार करके बिछाया ताकि प्रभु आराम से सो सकें। प्यास बुझाने के लिए उन्होंने मिट्टी का एक नया करवा (पात्र) लिया। उस करवे में अच्छी तरह छानकर निर्मल और शीतल जल भरा और उसे रस्सियों से बने एक छींके में सुरक्षित रूप से बांध लिया। इसके बाद प्रयागदास जी ने जल से भरा वह करवा अपनी पीठ पर लाद लिया और ओढ़ने-बिछौने से सजी भारी खटिया को अपने सिर पर रख लिया और वन की ओर चल पड़े।

सिर पर खटिया और पीठ पर पानी का करवा लादे हुए मामा प्रयागदास जी अयोध्या से चलते हुए सीधे चित्रकूट के बीहड़ जंगलों में पहुंच गए। वे पागलों की तरह पूरे वन में चारों ओर भटकते हुए अपनी जीजी सीता और जीजा श्रीराम को ढूंढने लगे कि वे दोनों मुझे कहां मिलेंगे? जंगल के रास्तों में उनके पैरों में कांटे चुभ रहे थे, शरीर पसीने से लथपथ था, लेकिन बहन और बहनोई के प्रेम की दीवानगी में उन्हें अपनी कोई सुध नहीं थी। वे बस यही चाहते थे कि जल्दी से भगवान मिलें ताकि वे उन्हें इस खटिया पर विश्राम करा सकें और करवे का ठंडा जल पिला सकें। उनकी इस निष्कपट और निस्वार्थ भक्ति को देखकर देवता भी हैरान रह गए।

श्रीराम ने मुस्कुराते हुए कहा, “देखो, हम वनवास में नहीं हैं, हमारे सिर पर मुकुट है और तुम्हारी जीजी भी बहुत खुश हैं।”

प्रयागदास जी ने भोलेपन से पूछा, “तो फिर आप यहाँ चित्रकूट में क्या कर रहे हैं?” प्रभु ने हंसकर उत्तर दिया, “हम तो बस यहाँ वन में ऐसे ही घूमने-फिरने आए हैं।” भक्त के इस अगाध समर्पण को देखकर स्वयं श्री सीताराम जी प्रयागदास जी द्वारा लाई गई उसी खटिया पर विराजमान हो गए और करवे से शीतल जल पिया।

भगवान के साक्षात दर्शन और आशीर्वाद के बाद मामा प्रयागदास जी का शेष जीवन उसी खटिया पर बीता। वे हमेशा एक नीम के पेड़ के नीचे अपनी वही खटिया बिछाकर मस्त पड़े रहते और सिरहाने की तरफ करवे में पानी रखा रहता। जब किसी ने उनसे पूछा कि आप कैसे परमात्मा के भक्त हैं, न माला फेरते हैं, बस खाली पड़े रहते हैं! तो उन्होंने अपनी सधुक्कड़ी वाणी में एक कालजयी दोहा कहा।

“नीम के नीचे खाट बिछी है, खाट के नीचे करवा।
प्रयागदास अलमस्ता सोवे, राम लला को सरवा”॥

  • पारिवारिक भाव की पराकाष्ठा: संतों की इस भावभूमि में ईश्वर कोई दूर आकाश में रहने वाली सत्ता नहीं, बल्कि सगे भाई और जीजा की तरह आत्मीय पारिवारिक संबंधी बन जाते हैं।
  • अगाध समर्पण: सिर पर भारी खटिया और पीठ पर शीतल जल का करवा लादकर नंगे पैर चित्रकूट के जंगलों में भटकना निस्वार्थ और निष्कपट भक्ति की चरम सीमा है।
  • रिश्ते से उद्धार: मामा जी का अटूट विश्वास था कि अन्य महात्मा भले ही कठिन जप-तप करें, वे तो भगवान के सगे साले हैं, और इसी एक आत्मीय रिश्ते के बल पर उनका कल्याण निश्चित है।

सियावर रामचंद्र की जय ॥ अवधपति रामचंद्र की जय ॥