बन में अलौकिक प्रसाद लीला
जीवन-वृत्त: बन में सिद्ध महापुरुषों की दिव्य लीला (अंश – कुसुमांजलि)
क अध्याय में श्रीमहाराज जी किसी वृद्ध पण्डित जी के साथ काशी से दूर बन में चले गये। वहाँ घूमते हुए दोपहर का समय हो गया। दोनों को बड़ी भूख लग आई। भोजन का कोई प्रबन्ध नहीं था। पास में कोई गांव भी नहीं था, कि भिक्षा ही मिल सके। बन में एक जीर्ण मन्दिर था, उसी में बैठे थे। पण्डित जी ने कहा— “अब खाने-पीने का क्या होगा?”
✨ दिव्य पुरुष का आगमन और पाँच पेड़ों का दोना
श्रीमहाराज जी के ऐसा बोलते ही इतने में एक व्यक्ति— जिसका आकार ऊँट चराने-वाले का-सा था, आया और पांच पेड़ों का दोना श्रीमहाराज जी के चरणों में रख कर प्रणाम किया और चला गया। दोनों ही जल-पान करने का आग्रह करने लगे। किन्तु दोनों में से कोई, इस विचार से कि दूसरा भूखा रहेगा, पेड़ा उठाता नहीं था। उनके मन में विचार आया कि इतने से होगा भी क्या?

आकाशवाणी और अक्षय प्रसाद का चमत्कार
जब दोनों संकोचवश पेड़ा नहीं उठा रहे थे, तब मन्दिर के ऊपर से कोई अदृश्य दिव्य शक्ति बोली— “संकोच मत करो, दोनों खाओ।” अब दोनों उठा कर खाने लगे।
“आश्चर्य यह कि पेड़े पांच के पांच ही रहे। दोनों ने भर पेट खाया। बचे पेड़े काशी में लौटकर बहुतों को प्रसाद में दिये। फिर भी पांच पेड़े दोने सहित गङ्गा जी में प्रवाहित करने पड़े। उन दिनों भी अन्नक्षेत्र में सब विद्यार्थियों को पर्याप्त भोजन नहीं मिल पाता था।”
