श्रद्धांजलि
अनन्तश्री ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु श्रीमच्छंकराचार्य श्रीविष्णुदेवानन्द सरस्वती जी की पावन लेखनी से
श्रीहरिबाबा जी महाराज पश्चिमोत्तर भारतकी महान विभू-तियोंमें से थे। नाम-संकीर्तनका वर्तमान समयमें आपने क्रियात्मक उपदेश किया । जिस समय भावावेश में स्वतः घण्टा-ध्वनि करते थे, उस समय उपस्थित व्यक्तियोंके हृदयमें नाम-ध्वनि की हिलोरें उठने लगती थीं। नामके ही बलसे कलिमल-हारिणी, पतित-पावनी भगवती गङ्गाजीपर इतना विशाल बाँधका निर्माण रूपी सामाजिक सेवा एवं राष्ट्रीयताका एक महान उदाहरण है। ऐसे बिरले ही महापुरुष हुआ करते हैं । ऐसे महापुरुषोंके सम्बन्ध-में जितना भी कहा, सुना, लिखा जाए उतना सब स्वल्प ही होगा ।
“जिस समय भावावेश में स्वतः घण्टा-ध्वनि करते थे, उस समय उपस्थित व्यक्तियोंके हृदयमें नाम-ध्वनि की हिलोरें उठने लगती थीं।”
मङ्गलकामना एवं शुभाशीर्वाद
एतदर्थ हमारी मङ्गलकामना एवं शुभाशीर्वाद है कि उपर्युक्त समारोह एवं स्मृतिग्रन्थ प्रकाशनकार्य निर्विघ्नता पूर्वक सम्पन्न होकर श्रीहरिबाबाजी महाराज के आदर्शोंका प्रचार-प्रसार अधिक हो सके ।
