क्या आपको सचमुच भगवान की चाहत है? एक बार खुद से पूछें यह सवाल

लोग अक्सर पूछते हैं, “भगवान कैसे मिलेंगे?”

पर यदि मन के भीतर झाँककर देखा जाए, तो प्रश्न कुछ और ही दिखाई देता है।

क्या सचमुच हमें भगवान चाहिए?

यदि आज भगवान स्वयं हमारे सामने प्रकट होकर पूछ लें—”बताओ, क्या चाहते हो?”—तो कितने लोग कहेंगे, “मुझे केवल आपकी भक्ति और आपका सान्निध्य चाहिए।”

अधिकांश लोग तो यही माँगेंगे— “मेरा परिवार सुखी रहे, व्यापार बढ़ जाए, धन मिल जाए, संतान सफल हो जाए, रोग दूर हो जाए, सम्मान मिल जाए।”

यही कारण है कि भगवान की प्राप्ति दुर्लभ लगती है। क्योंकि हमारी चाहत भगवान नहीं, भगवान से मिलने वाले लाभ होते हैं।

सत्संग में भी कई लोग भावुक होकर रोते हैं। लेकिन यदि मन को ध्यान से देखें, तो अधिकांश आँसू भगवान के वियोग में नहीं, बल्कि अपने जीवन की पीड़ाओं, टूटे रिश्तों, अपनों की याद, असफलताओं और संसार के दुःखों के कारण बहते हैं।

यदि वही तड़प, वही व्याकुलता, वही आँसू भगवान के लिए बहने लगें… यदि मन सचमुच उन्हें पाने के लिए बेचैन हो जाए… तो फिर भगवान दूर नहीं रहते।

उड़िया बाबा महाराज कहते थे कि भगवान शब्दों से नहीं, सच्ची तड़प से मिलते हैं। जिस दिन संसार से अधिक प्रिय भगवान हो जाएँ, उसी दिन से ईश्वर की ओर यात्रा वास्तव में प्रारम्भ होती है।

अपने आप से एक प्रश्न अवश्य पूछिए— क्या मैं भगवान को चाहता हूँ… या केवल भगवान से मिलने वाले सुखों को?

यही प्रश्न साधना की दिशा भी तय करता है और ईश्वर प्राप्ति की दूरी भी।

(संकलनकर्ता – वरुण )