“घनश्याम“ साधारण बृजवासी बालक नही है ….ये साक्षात् ठाकुर जी ही है”

श्रीवृन्दावन में उड़िया बाबा जी के आश्रम में ये रास लीला चल रही है …..रास लीला का दर्शन करने वालों में स्वयं सिद्ध सन्त उड़िया बाबा जी , हरि बाबा जी , आनन्दमयी माता पण्डित गया प्रसाद जी आदि आदि अनेक संतों के साथ साथ रास लीला के रसिकों की भी पूरी भीड़ थी ।

आज लीला हो रही थी – “ऊखल बन्धन”

और इस लीला में मैया यशोदा ने अपने कन्हैया को बाँध दिया था ।

मैया ! मत बाँध ….

ये आनन्दमयी माता की पुकार थी ….उनको आज “ऊखल बन्धन लीला” का दर्शन करते ही भाव का उन्माद चढ़ गया था ….वो मंच पर चढ़ गयीं और मैया यशोदा के चरणों में गिर गयीं थीं ….मैया ! मत बाँध …मैया ! मत बाँध …यशोदा का पात्र निभा रहे व्यक्ति ने असहज होकर स्वामी की ओर देखा …रास मण्डली के स्वामी ने पर्दा गिराने का आदेश दिया …पर पर्दा गिरता उससे पहले ही ठाकुर जी आनन्दमयी माता की गोद में बैठ गये …और गोद में छुपने लगे ….आनन्दमयी माता ने अपने आँचल में छुपा लिया ..इस झाँकी का दर्शन करके पण्डित गयाप्रसाद जी उठकर नाचने लगे थे ….उड़िया बाबा जी की समाधि लग गयी थी ….हरिबाबा जी भावोन्मत्त होकर पंखा झलने लगे थे ।

पर ये क्या !

स्वरूप बने ठाकुर जी आवेश में बोले …”माता ! कुबेर के पुत्र अपने उद्धार की प्रतीक्षा कर रहे हैं …उनका उद्धार करना है इसलिये मुझे बँधना पड़ेगा”।

आनन्दमयी माता चौंक गयीं थीं …स्वरूप ठाकुर जी साक्षात् ठाकुर जी ही थे ….उनका मुखमण्डल दिव्य आभा से दमक रहा था …….

“घनश्याम“ साधारण बृजवासी बालक नही है ….ये साक्षात् ठाकुर जी ही है” ….पण्डित गया प्रसाद जी रास लीला के पश्चात् आनन्दमयी माता को बता रहे थे ।