श्री महराज जी (पूज्य उड़ियाबाबा जी महराज ) के संकल्प मात्र से कार्य सिद्ध होजाते थे
संस्मरण – द्वारा श्रीमती ठकुरानी साहिब

मेरे पति आनरेरी मजिस्ट्रेट थे। एक दिन श्रीमहाराजजी के समक्ष चर्चा चली कि यह एक राजकीय सम्मान है। आप बोले, यह सम्मान तो तुच्छ है, सम्मान तो उपाधि का ही माना जाता है।” श्रीमहाराजजी ने जिस समय रामघाट में यह बात कही, उसी समय घर पर तत्कालीन कलक्टर ल्यूस साहब की सूचना आयी कि साहब ने कुंवर साहब को बुलाया है। किन्तु कुंवर साहब तो रामघाट में ‘थे । वहाँस एक मास पश्चात् लौटने पर कलक्टर साहब मिले । तब उन्होंने बतलाया कि मैंने आपके लिये ‘रायबहादुर’ उपाधि की सिफारिश की है। इस प्रकार श्रीमहाराजजों के संकल्प मात्र से अनायास ही कुंवर साहब को राय बहादुर की उपाधि प्राप्त हो गयी, जो दूसरों को बहुत प्रयत्न करने पर मिलती थी।
