परम भागवत ब्रह्मलीन स्वामीभागवत मर्मज्ञ स्वामी अखंडानंद सरस्वती जी महाराज का पावन जीवन चरित्र और अलौकिक विद्वता अखंडानंद सरस्वती जी महाराज

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वेदांत के प्रकांड विद्वान और श्रीमद्भागवत के अद्वितीय मर्मज्ञ, परम भागवत ब्रह्मलीन स्वामी अखंडानंद सरस्वती जी महाराज का आध्यात्मिक जीवन संपूर्ण विश्व के कथा व्यासों और सनातन धर्मावलंबियों के लिए प्रकाश स्तंभ है। पूज्य उड़िया बाबा जी के सानिध्य में रहकर आपका संपर्क श्री हरिबाबा जी महाराज से प्रगाढ़ हुआ था।

पावन प्राकट्य एवं बाल्यावस्था

वेदांत के अनुपम सूर्य स्वामी जी का जन्म २५ जुलाई सन् १९११ को पुण्यमयी नगरी वाराणसी के मेहराई गाँव में हुआ था। हिंदू पंचांग के अनुसार, श्रावण मास की अमावस्या, पुष्य नक्षत्र और पवित्र शुक्रवार के शुभ संयोग में आपका प्राकट्य एक परम धार्मिक सरयूपारीण ब्राह्मण परिवार में हुआ।

आपके बचपन का पावन नाम ‘शांतनु’ था। संन्यास ग्रहण करने के पश्चात संपूर्ण विश्व के भक्त आपको श्रद्धा से केवल ‘महाराज जी’ कहकर संबोधित करते थे। स्वामी जी ने अपनी माता जी से रामायण का मधुर गान सीखा था, जिसने उनकी चेतना में भक्ति का बीजारोपण किया।

दिव्य विग्रह एवं साहित्य सेवा दर्शन

महाराज जी का विग्रह साक्षात ज्ञान और वैराग्य की सजीव प्रतिमूर्ति था। उनके द्वारा रचित साहित्य आज भी मार्गदर्शन करता है।


स्वामी अखंडानंद सरस्वती जी

पूज्य महाराज जी का दिव्य स्वरूप


श्रीमद्भागवत कथा व्यास

व्यासपीठ पर विराजमान मर्मज्ञ स्वरूप

अलौकिक विद्वता एवं सनातन ग्रंथों का अनुवाद

महाराज जी की विलक्षण बुद्धि और सनातन धर्म के प्रति निष्ठा की कुछ ऐसी असाधारण कड़ियाँ हैं, जो बहुत कम लोगों को ज्ञात हैं:

  • श्रीमद्भागवत कंठस्थ: जब अखंडानन्द जी केवल १० वर्ष के थे, तभी उनके दादा ने उन्हें मूल भागवत को संस्कृत में पढ़ना सिखाया था। स्वामी जी ने मात्र १० वर्ष की अल्पायु में ही अपने दादा जी को संपूर्ण श्रीमद्भागवत सुना दी थी।
  • गीताप्रेस ‘कल्याण’ सेवा: संन्यास मार्ग पर पूर्ण रूप से जाने से पहले, १९३४ से १९४२ तक उन्होंने कई दिव्य किताबें एवं लेख प्रकाशित किए, जब वे गीताप्रेस में प्रसिद्ध पत्रिका ‘कल्याण’ के सम्पादकीय बोर्ड के सदस्य थे।
  • ग्रंथों का हिंदी अनुवाद: गीताप्रेस की संपादकीय परिषद के कार्यों के साथ ही उन्होंने अनेक पुराणों, गीता, महाभारत और वाल्मीकि रामायण जैसे महान ग्रंथों का हिंदी में अनुवाद किया। पहले इन ग्रंथों के संस्करणों में गीताप्रेस के प्रकाशनों में स्वामी जी के नाम का विशेष उल्लेख होता था।
  • व्यास दीक्षा के प्रदाता: यह रहस्य बहुत कम लोगों को ज्ञात होगा कि रामकथा के अमर हस्ताक्षर पूज्य स्वामी रामकिंकर जी महाराज ने पूज्य स्वामी अखंडानंद जी से ही रामकथा की व्यासदीक्षा ग्रहण की थी।
  • शंकराचार्य दीक्षा: ज्योतिष्पीठाधीश्वर शंकराचार्य जगद्गुरु स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती जी महाराज से स्वामी जी ने संन्यास की परम दीक्षा प्राप्त की थी।

साधकों के लिए महाराज जी के पंचामृत उपदेश

महाराज जी के संवादों और साहित्यों से लिए गए वे मुख्य सूत्र जो हर भक्त के मन को शांति देते हैं:

  • संसार को सत्य मत मानो: यह संसार एक बहती हुई नदी या चलते हुए सिनेमा के पर्दे जैसा है। इसमें जो कुछ दिख रहा है, वह निरंतर बदल रहा है। जो बदल रहा है उससे दिल मत लगाओ, बल्कि जो कभी नहीं बदलता उस परमात्मा से प्रीति करो।
  • कर्म को ही पूजा बनाओ: जब आप अपना कर्तव्य कर्म बिना किसी स्वार्थ और फल की इच्छा के केवल भगवान को प्रसन्न करने के लिए करते हैं, तो वही साधारण कर्म आपकी सबसे बड़ी पूजा और साधना बन जाता है।
  • दुख का मूल कारण क्या है: दुख परिस्थितियों के कारण नहीं आता, बल्कि हमारी अपनी आसक्ति और मोह के कारण आता है। जब हम किसी व्यक्ति या वस्तु को अपनी मर्जी से चलाना चाहते हैं, तो हमें दुख मिलता है। सब कुछ भगवान की मर्जी पर छोड़ देना ही परम शांति का मार्ग है।
  • श्रीमद्भागवत की महिमा: भागवत केवल एक ग्रंथ नहीं है, वह साक्षात कृष्ण का वांग्मय विग्रह (शब्द स्वरूप) है। इसका श्रवण और पठन मनुष्य के हृदय की शुद्धि कर अंत समय में मोक्ष का द्वार खोल देता है।
  • सच्ची शरणागति: भगवान के सामने यह मत कहो कि ‘मैं आपका हूँ’, बल्कि हृदय से यह स्वीकार करो कि ‘प्रभु, आप मेरे हैं।’ जब ईश्वर को अपना मान लिया जाता है, तो फिर जीवन में कोई भय या चिंता शेष नहीं रह जाती।

समस्त व्यासपीठों के परम आश्रय और प्रेरणा

भारत अथवा विश्व में आज भी जितने भी कथा व्यास आचार्य हैं, उनकी कथाओं में बार-बार स्वामी अखंडानंद जी महाराज का उल्लेख आ ही जाता है। पूज्य रमेश भाई ओझा, भूपेंद्र भाई पंड्या, मोरारी बापू, राजेंद्र दास जी, जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी, जगद्गुरु स्वामी राघवाचार्य जी, प्रेम मूर्ति प्रेम भूषण जी या राजन जी की कथा हो; अथवा परमपूज्य शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी, स्वामी गुरुशरणानंद जी, गिरिशानंद जी महाराज हों या अन्य अनेक महाभाग; सभी को स्वामी अखंडानंद जी के अगाध साहित्य और संवाद ने दिव्य प्रेरणा और प्रश्रय अवश्य दिया है।


आनंद वृंदावन आश्रम बैनर

परम भागवत के ज्ञान की अविरल रसधारा

ब्रह्मलीन स्वामी अखंडानंद सरस्वती चरणे साष्टांग दण्डवत्