वृन्दावन आश्रम की अलौकिक गाय लीला
सत्य घटना: सिद्ध महापुरुषों की अदृश्य संकल्प-शक्ति का साक्षात् प्रमाण
री वृन्दावन के हरिबाबा जी के आश्रम में ८ मई १९८३ की घटना है। आश्रम की एक दूध देने वाली गाय बाहर चरने को प्रातः ८ बजे जाया करती थी। इस दिन जिधर गाय चर रही थी, उधर से १० बजे कुछ राजस्थानी चरवाहे गाय-बछड़े का एक झुण्ड लेकर निकले, तो आश्रम की गाय भी उनके झुण्ड में जा मिली और चरवाहे के प्रयास करने पर भी वह झुण्ड के साथ जाने से न रोकी जा सकी।

✨ निराशा के क्षण और मन्दिर में आर्त प्रार्थना
इस घटना की सूचना एक महात्मा के द्वारा आश्रम में १० बजे मिली और तुरन्त ही गाय ढूंढ़ने के लिए एक कार्यकर्त्ता साइकिल से और एक तांगे से निकल पड़े। वे मथुरा के पास तक घूमकर १२ बजे दोपहर तक वापस निराश होकर लौट आए। जिस समय आश्रमवासी अत्यंत चिंतित होकर विचार कर रहे थे कि अब क्या करें, उसी समय हमारे एक परिचित महात्मा ने श्रीहरि-बाबा जी और श्री महाप्रभु जी से मन्दिर में जाकर करुण प्रार्थना की— “महाराज! ऐसी घटना हो गई है। हमारी दौड़ तो आप तक ही है, अब जैसा आप उचित समझें करें।”
१० मिनट बाद उठा दिव्य संकल्प
आर्त प्रार्थना के बस १० मिनट बाद ही, आश्रम में चन्द दिन पूर्व आये एक नवयुवक महात्मा के मस्तिष्क में अचानक यह दिव्य संकल्प उठा कि गाय अवश्य मिल जायेगी। उसने दृढ़तापूर्वक कहा— “मैं गाय ढूँढने जाता हूँ और उसको लेकर ही वापस आश्रम में लौटूंगा।”
ठीक उसी समय, पास के एक ग्राम के एक भक्त के सामने से वे बनजारे गाय-बैलों का झुण्ड लेकर निकले। तो उस भक्त के हृदय में अनायास ही यह विचार उठ पड़ा कि— “सामने वाली गाय तो हरिबाबा जी के आश्रम की है, इस झुण्ड में कैसे आई?” और उसने उस गाय को युक्ति से अपने घर में बाँध लिया।
बुझरिया ग्राम में साक्षात् सिद्धि
जब यह नवयुवक महात्मा लगभग १ बजे दोपहर में आश्रम से चला, तो यहाँ का एक कार्यकर्त्ता भी उसके साथ हो लिया। वे इधर-उधर पता लगाते रहे कि बनजारे झुण्ड लेकर किधर गये हैं। खोजते-खोजते वे लगभग ३ बजे बुझरिया ग्राम में पहुँच गये। वहाँ उन्हें अत्यधिक प्यास लगी, तो एक कुएँ के पास खड़े एक वृद्ध किसान से उन्होंने पानी पिलाने को कहा।
उस वृद्ध किसान ने आदरपूर्वक पानी पिलाया और स्वयं भी पिया, फिर पूछा— “आप लोग इस भीषण धूप में कैसे घूम रहे हो?” जब उसे सारी घटना बताई गई, तब उसने तुरंत पता बताते हुए कहा— “एक गाय को अमुक व्यक्ति ने बनजारों के झुण्ड में से रोक कर अपने यहाँ बाँधा है। आप जाकर देखो तो सही, कहीं वही तो आश्रम की गाय नहीं है!”
वहाँ जाकर देखा तो सचमुच वह आश्रम की ही प्रिय गाय निकली। उस भक्त ने बातों-बातों में जब यह जाना कि ये लोग पूज्य हरिबाबा जी के आश्रम से ही आए हैं, तो उसने सहर्ष गाय उन्हें सौंप दी। वे सब सायँ ५ बजे तक गाय लेकर सकुशल आश्रम में लौट आए।
यह सत्य घटना क्या सिद्ध करती है?
आप स्वयं ठंडे दिमाग से सोच और समझ सकते हैं कि यह सत्य घटना क्या सिद्ध करती है! गाय को बाँधने वाला वह ग्रामीण व्यक्ति कभी-कभार ही आश्रम आता था। आश्रम का कोई भी कार्यकर्त्ता उससे पूर्व से परिचित नहीं था, फिर उसने किस प्रकार इतनी बड़ी भीड़ में पहचान कर गाय बाँध ली? और इधर एक नया महात्मा बिना किसी सूचना के, केवल एक आंतरिक विचार लेकर यूँ ही ढूँढने चल पड़ा! यह सब कुछ और नहीं, बल्कि साक्षात् **श्रीहरि बाबा जी और श्रीमन महाप्रभु जी** की अदृश्य एवं सर्वव्यापी संकल्प-शक्ति का ही चमत्कार था।
प्रेषक: मौनी बाबा (गंगाराम)
श्याम बगीचा, दावानल कुण्ड, वृन्दावन
