श्री हरिबाबा जी की संन्यास-दीक्षा

श्री हरिबाबा जी की संन्यास-दीक्षा

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जीवन-वृत्त: श्री हरिबाबा जी की संन्यास-दीक्षा – और श्री कपिल भगवान के दर्शन (अंश – कुसुमांजलि)

चपन में रात को अपनी दादी के साथ सोते थे। दादी रात को दो बजे उठ कर भजन में बैठ जातीं। बालक को भी जगाकर भजन में बैठा देतीं। कहतीं— ‘बच्चा! उठ बैठो। यह मनुष्य शरीर भजन के लिए मिला है।’ कुछ बड़ा होने पर गायें चराने चले जाते। बन में कभी भेड़िया आ जाता तो गायें चारों ओर से घेर कर बालक की रक्षा करतीं।

परम पूज्य श्रीहरि बाबा जी महाराज

परम पूज्य श्रीहरि बाबा जी महाराज

✨ सिद्ध महापुरुष की शरण और कठोर वैराग्य

गाँव में एक सिद्ध तेजस्वी महापुरुष आये। घरवाले इस भय से कि कहीं साधु न हो जायें, उनके पास जाने से रोकते। एक बार कोठरी में बन्द कर दिया। घर वालों को निद्रा आ जाने पर महाराज जी बड़ी चातुरी से खिड़की को उखाड़ कर बाहर चले आये और खिड़की को पहले जैसे ही बन्द कर दिया। महात्मा जी के पास मोह-ममता छोड़कर चले गये। वे महापुरुष हर समय महान् आनन्द में मग्न रहते थे। दिन-रात में केवल दो घड़ी सोते थे। वह भी लेटकर नहीं, केवल बैठे-बैठे या दीवारादि के सहारे।

वन में रात्रि साधना और पूर्णता

वे महापुरुष रात के दो बजे ही श्रीमहाराज जी को साथ लेकर बाहर जंगल में नदी के किनारे जाकर ध्यान में बैठ जाते और श्रीमहाराज जी को भी बैठा देते। दोपहर को भिक्षा निमित्त उठते और फिर आकर ध्यान करते।

“एक रात महाराज जी को लात मारकर जगाया। इनके मन में आया— वैसे ही जगा देते लात क्यों मारी? फिर विचार आया— बहुत अच्छा हुआ। अब आगे कभी सोया नहीं रह सकूँगा। इस प्रकार कुछ वर्ष महापुरुष के साथ साधन करते-करते श्रीमहाराज जी ने ज्ञान, भक्ति, योग आदि में पूर्णता प्राप्त की।”

इस के बाद करीब एक वर्ष तक और साधन में रहे, जिससे अपने को प्राप्त अनुभव दूसरों को भी करा सकें। इसके बाद महापुरुष ने आज्ञा दी— ‘जो प्राप्त करने योग्य था वह प्राप्त हो गया। अब काशी जाकर शास्त्र-अध्ययन करो।’ महाराज जी ने पूछा— “अब शास्त्र की क्या आवश्यकता रही?” उन्होंने कहा— “इस से अनुभव दृढ़ होगा और कोई सन्देह शास्त्र-सम्बन्धी नहीं रहेगा।”

काशी गमन और संन्यास-दीक्षा

आज्ञा मानकर काशी गये। वहाँ “श्रीगोविन्दानन्द कान्हानन्द जी” के मठ में विधि-पूर्वक संन्यास-दीक्षा ग्रहण कर ली। शास्त्र-अध्ययन आरम्भ किया। उन दिनों केवल दो घण्टे सोते थे। आश्रम की सब सेवा करते। रात को बारह बजे सोकर दो बजे उठ जाते। दो बजे ही गङ्गा जी स्नान के लिए चले जाते। घाट पर ही जब तक लोग आने नहीं लगते थे, उच्चस्वर से स्तोत्रों का पाठ करते।

श्री कपिल भगवान के अलौकिक दर्शन

एक दिन श्रीमहाराज जी ने देखा कि घाट पर एक दिव्य पुरुष कहते हैं कि “मैं तुम्हारा पाठ सुनकर बड़ा प्रसन्न हुआ हूँ। क्या तुम मेरे आश्रम में चलोगे?” श्रीमहाराज जी ने कहा, “इससे अधिक और क्या सौभाग्य होगा?” वह बोले— “डरोगे तो नहीं।” श्रीमहाराज जी बोले— “यदि महापुरुषों की संगति में भी डर रहा तो डर दूर कहाँ होगा?” वे बोले— “अच्छा आ जाओ।” यह कहकर एकदम गङ्गा जी में प्रवेश कर गये। किन्तु महाराज जी का साहस नहीं हुआ।

इसके बाद अन्नपूर्णा जी के मन्दिर में उत्सव था। उसे देखने श्रीमहाराज जी मन्दिर में पधारे। वही दिव्य पुरुष ब्राह्मण रूप में मिले और कहने लगे— “तुम तो कहते थे कि नहीं डरूंगा, फिर कैसे रह गये?” श्रीमहाराज जी ने उनके चरण पकड़ लिये। कहा कि— “अब ऐसा नहीं होगा।” वह बोले— “जैसे शास्त्र में लिखा है, ऐसी निष्ठा तो कहीं देखने में नहीं आती।” श्री महाराज जी बोले— “शास्त्र असत्य नहीं है।” वे बोले— “क्या तुमने ऐसा पुरुष देखा है?” श्री महाराज जी ने कहा— “देखा है और आपको भी दिखला सकता हूँ।”
अध्ययन के दिन श्रीमहाराजजी उन्हें वरुणाके तट पर ले गये । बोले- क्या सुहावना एकान्त स्थान और समय है। आइये भजन-ध्यानमें बैठ लें।” वे बोले-“भाई ! तुम्हारा मन भजनको करता है तो बैठ जाओ, मैं क्यों बैठूं। बैठने पर मन तो एकाग्र होगा नहीं।” श्रीमहाराजजी बोले – “गुरुजनों का आचरण ही शिष्य के लिये आदर्श होता है। कृपया मेरे लिए ही बैठ जायें ।” वे बोले “अच्छा, तू नहीं मानता है तो बैठ जाता हूँ।” दोनों बैठ गये। श्रीमहाराजजी ने अपने संकल्प से ही उनकी निर्विकल्प समाधिकी अवस्था करदी जिससे वे महान् आनन्दमें डूबकर सब सुध-बुध भूल गये । समय-का पता ही न रहा। जब बहुत विलम्ब हो गया तो श्रीमहाराजजी ने उनके शरीरको हिला कर बड़े यत्न से जगाया । वे अत्यन्त आनन्द और आश्चर्य में भर गये और श्रीमहाराजजी के चरणों में पड़ गये, यह कहते हुए कि – “आजसे तुम गुरु और मैं शिष्य ।”

“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥”