भगवत्-मार्ग में प्रवृत्ति
परम पूज्य श्री हरि बाबा जी महाराज ने स्वयं अपने गुरु का यह वृत्त लिखा था (अंश – कुसुमांजलि)
अपने बड़े भाई साहब की कृपा से भगवत्-मार्ग में प्रवृत्ति हुई। उनको श्रीगुरु महाराज (श्री श्रीसच्चिदानन्द गिरि महाराज) की चरण-शरण प्राप्त हो चुकी थी। मुझसे बोले— ‘मैं तुम्हें मार्ग बताता रहूँगा, अभी तुम श्रीगुरु महाराज के दर्शन के अधिकारी नहीं हो।’ इस प्रकार कई वर्ष बीत गये। बहुत आग्रह करने पर सप्ताह में एक दिन जाने की आज्ञा दी। कहा, ‘खाली हाथ कभी नहीं जाना।’
✨ श्रीगुरु महाराज का अलौकिक प्रभाव
दर्शन करने पर महाराज जी का बड़ा भारी प्रभाव पड़ा। नजर उठाकर देखने की अथवा प्रश्न करने की हिम्मत नहीं पड़ती थी। सत्संगियों से सुना करता था कि ऐसे समर्थ महापुरुष और कहीं भी नहीं हैं।
समाधि की जिज्ञासा और प्रसाद महिमा
एक बार बड़ी हिम्मत करके प्रार्थना की— “समाधि कैसे हो?” आज्ञा हुई— “विचार से।”
सप्ताह में एक दिन जाता। जो थोड़ा-सा प्रसाद लौटाते, उसमें अपूर्व रस का स्वाद मालूम होता। सुबह-शाम एकान्त में बैठ-कर ध्यान किया करता। चित्त लग जाता।
ध्यान एवं पारमार्थिक स्वाध्याय विधि
“पारमार्थिक पुस्तक की केवल एक या दो पंक्ति पढ़कर, पुस्तक बन्द कर उसके अर्थ में चित्त लगाना। एकाग्रता भंग होने पर, फिर दूसरी पंक्ति के अर्थ में चित्त एकाग्र करना।”
