१०० रुपये के बदले मिला १ हजार का चढ़ावा! फिर श्रीहरि बाबा जी ने माता जी को कैसे कराई ‘निर्विकल्प समाधि’?

निर्विकल्प समाधि और गुरु-भेंट की पावन लीला

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जीवन-वृत्त: परम पूज्य श्रीहरि बाबा जी महाराज की अलौकिक सामर्थ्य (अंश – कुसुमांजलि)

रीमहाराज जी भिक्षा के लिए एक माता के घर जाया करते थे। वे माता जी धन से सम्पन्न, परम श्रद्धावती और अनन्य भक्तिमती थीं। वे सदा श्री महाराज जी से प्रेमपूर्वक हठ किया करतीं और कहा करतीं— “मुझे निर्विकल्प समाधि का अनुभव करा दो।”

परम पूज्य श्रीहरि बाबा जी महाराज

परम पूज्य श्रीहरि बाबा जी महाराज

✨ वृद्ध महात्मा की उदासी और बाबा जी का संकट-निवारण

एक कोई वृद्ध महात्मा थे जो श्रीमहाराज जी से भली-भाँति परिचित थे। एक दिन वे अत्यधिक उदास दीख पड़े। श्रीमहाराज जी ने करुणावश पूछा— “महाराज ! उदास कैसे हो ?” वे बोले— “मुझे अपने गुरुदेव के निमित्त भण्डारा करना है। उसके लिए सौ रुपये की अत्यंत जरूरत है, किन्तु मेरे पास इस समय कुछ भी नहीं है।” श्रीमहाराज जी ने उन्हें ढाँढस बंधाते हुए कहा— “श्रीभगवान् अपने भक्तों की सब इच्छाएँ पूर्ण करते हैं। आप पूर्णतः निश्चिन्त रहें।”

गुरु-बुद्धि का उपदेश और सर्वस्व समर्पण

इसके पश्चात् श्री महाराज जी उसी श्रद्धावती माता जी के घर गये और बोले— “तुम रोज ब्रह्मज्ञान और समाधि के लिए कहती हो, किन्तु बिना गुरुबुद्धि के उपदेश और मन्त्र सिद्ध नहीं होता। यथा-शक्ति भेंटपूर्वक ही गुरु की शरण ग्रहण की जाती है।”

माता जी ने अत्यंत नम्रता-पूर्वक हाथ जोड़कर प्रार्थना की— “हे महाराज! मेरा सर्वस्व सहर्ष आपके श्रीचरणों में अर्पित है।” ऐसा कह कर उन्होंने एक हजार रुपयों की थैली बाबा जी के चरणों में रख दी। श्री महाराज जी ने आज्ञा दी— “इसमें से सौ रुपये निकाल दो।”

निर्विकल्प समाधि का साक्षात् अनुभव और परम त्याग

रुपये निकालने के पश्चात् श्रीमहाराज जी ने उस माता जी को ध्यान में बैठाया। बाबा जी की कृपा और दिव्य सामर्थ्य से उन्हें तुरंत ही निर्विकल्प समाधि हो गयी। बहुत समय तक उन्हें अपनी देह की और इस नश्वर संसार की कोई सुध-बुध नहीं रही। काफी समय बीतने पर श्रीमहाराज जी ने उन्हें हिलाकर जगाया। समाधि से उठने पर वह स्वयं को कृत-कृत्य महसूस करने लगीं।

तत्पश्चात, परम त्यागी श्रीमहाराज जी ने उन रुपयों को स्वयं छूआ तक नहीं और सीधे ले जाकर उक्त वृद्ध महात्मा के सिरहाने रख दिया, जिससे उनका भण्डारा निर्विघ्न संपन्न हो सके।

“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥”