श्रद्धांजलि
मैंने अपने जीवन में जितने सत्पुरुषों के दर्शन किये हैं उन में श्रीहरिबाबाजी महाराज एक विलक्षण एवं अलौकिक महापुरुष थे। लोग उनको बाँध वाले बाबा या कीर्त्तन का प्रचार करने वाले बाबा के रूप में जानते हैं। परन्तु मैंने उन्हें असंगताकी मूत्तिके रूपमें देखा है। उनके जीवन में कहीं किसीके साथ कोई लगाव था ही नहीं। पूजा भी करें, साष्टाङ्ग दण्डवत् भी करें और फिर चुप-चाप चले भी जायें। सिंहासन पर बैठाकर भग-वान मान लें और फिर उससे मिलना बोलना भी बन्द कर दें। अपने बड़ेसे बड़े भक्तको वे तत्काल छोड़ सकते थे और चले भी जाते ।
“पूजा भी करें, साष्टाङ्ग दण्डवत् भी करें और फिर चुप-चाप चले भी जायें। सिंहासन पर बैठाकर भगवान मान लें और फिर उससे मिलना बोलना भी बन्द कर दें।”
उनकी गुरुनिष्ठा अविचल रही । पंखा झलते किसीको, ध्यान रखते गुरुजी का। उनकी वेदान्त निष्ठा युवावस्था से ही स्वाभाविक हो गयी थी। आचार में श्रीरामचन्द्रका प्रतिबिम्ब था। संकीर्त्तन में श्रीचैतन्यमहाप्रभु प्रकट हो जाते थे । उनकी बोलचाल, मुस्कान, चितवन सब में प्रेम तो छलकता था, परन्तु संयम भी प्रत्यक्ष देखनेमें आता था। उन की छत्र-छाया में आकर ढोंगी भी सच्चे भक्त बन जाया करते थे। उनके द्वारा किया हुआ गरीबों का, किसानों का, गाँव वालों का उपकार बेजोड़ है।
- अविचल गुरुनिष्ठा: पंखा झलते किसी और को थे, परन्तु पूर्ण ध्यान सदैव अपने पूज्य गुरुजी का रखते थे।
- चरित्र में राम-प्रतिबिम्ब: आपके पावन आचार और व्यवहार में साक्षात श्रीरामचन्द्र जी की मर्यादा झलकती थी।
- संकीर्तन रस: जब आप हरिनाम संकीर्तन करते थे, तो ऐसा प्रतीत होता था मानो श्रीचैतन्यमहाप्रभु स्वयं प्रकट हो गए हों।
एक सत्पुरुषका जैसा आदर्श जीवन होना चाहिये, वह मैंने उनके जीवन में देखा था। उनके जीवन में जैसे जीवनमुक्त पुरुष-के जीवन में व्यवहारमें सबके साथ यथायोग्य अभिनय होता है, प्रत्येक क्रियामें वैसा ही अभिनय था। उन्होंने अपने समयको भगवन्नाम, सत्संग और भगवानकी लीलासे भर दिया था। उन-के स्मरणसे हृदय पवित्र होता है।
