त्याग और वैराग्य की प्रतिमूर्ति थे हमारे बाबा- पूज्य उड़ियाबाबा जी

त्याग और वैराग्य की प्रतिमूर्ति थे हमारे बाबा- पूज्य उड़ियाबाबा जी

रामघाट में इमली के नीचे एक फूस की कुटी थी। उसमें सिरकी लगी थी। बाहर एक लँगोटी और भीतर जल भरा कमण्डलु । भगवती भागीरथी के तट पर उस महान् योगी की पर्ण-कुटी त्याग-वैराग्य की प्रतीक थी। प्रातःकाल आप किसी से मिलते नहीं थे। प्रायः पाँच-छः घण्टे निरन्तर एक आसन से बैठे ध्यान मग्न रहते थे। उस समय कोई उनके समीप जा नहीं सकता था । मध्याह्न में गांव में भिक्षा करने जाते और तीसरे पहर सत्संगियों की शङ्काओं का समाधान करते थे। यही उनकी चर्या थी ।

 

 उपदेश करने की अद्भु शैली

महाराज के उपदेश करने की शैली ऐसी अद्भुत थी कि सुनते ही बनता था। आप बिना कुछ पूछे यों ही उपदेश नहीं करने लगते थे। जो जैसा अधिकारी होता उसे प्रश्न करने पर वैसा ही उपदेश करते थे। जो भक्तिनिष्ठ होता उसकी शङ्का का वे सर्वतोभावेन भक्ति का निरूपण करके और जो ज्ञाननिष्ठ होता उसके प्रश्न का ऊँचे से ऊंचे वेदान्त-सिद्धान्त के प्रतिपादन द्वारा निराकरण करते थे तथा योगनिष्ठा को उसके अधिकारानुसार योग का उपदेश कर देते थे। उनके यहाँ से ज्ञानी, भक्त, आर्यसमाजी, मुसलमान या ईसाई कोई भी असंतुष्ट रह कर नहीं लौटता था।