पूज्य श्री उड़िया बाबा जी द्वारा गीता सार (1 से 9 श्लोक)

पूज्य श्री उड़िया बाबा जी द्वारा गीता सार 

श्री गीतातत्त्वालोक अथ प्रथमोऽध्यायः

(1से 9श्लोक )

धृतराष्ट्र उवाच

 

1)धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः । मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ।।१ ।।

 

धृतराष्ट्र ने कहा- हे सञ्जय ! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्रित हुए मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया।

 

प्रश्न- ‘किम् अकुर्वत’ यह शब्द सन्देह सूचक है। जब वे युद्ध के लिये गये थे तो धृतराष्ट्र को ऐसा सन्देह क्यों हुआ?

 

उत्तर- महात्माओं के पास तथा तीर्थादि पवित्र स्थानों में जाकर बुद्धि शुद्ध हो जाती है तथा काम-क्रोधादि वृत्तियाँ भी दब जाती हैं। अतः धृतराष्ट्र को यह सन्देह हुआ कि ये लोग धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में एकत्रित हुए हैं; सम्भव है कि इनकी बुद्धि शुद्ध हो गयी हो और मेरे पुत्रों ने पाण्डवों को उनका राज्य देना स्वीकार कर लिया हो तो सम्भव है कि सन्धि करके दोनों पक्ष युद्ध से निवृत्त हो गये हों।

 

2)दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा। आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत् ।।२।।

 

सञ्जय बोले- तब राजा दुर्योधन ने व्यूह के आकार में सुव्यवस्थित पाण्डव सेना को देखकर द्रोण के पास जाकर ये वचन कहे।

 

3)पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् । व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ।।३।।

हे आचार्य ! आपके बुद्धिमान् शिष्य द्रुपद-पुत्र धृष्टद्युम्न द्वारा व्यूहाकार स्थापित पाण्डवों की इस विशाल सेना को आप देखिये।

 

4)अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि। युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ।।४।।

 

इस सेना में भीम और अर्जुन के समान बड़े धनुर्धारी सात्यकि, विराट और महारथी द्रुपद-जैसे शूरवीर हैं।

 

5)धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्। पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः ।॥५॥ 

6)युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्। सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ।।६।।

बलवान् धृष्टकेतु, चेकितान और काशिराज तथा नरश्रेष्ठ पुरुजित् कुन्तिभोज और शैव्य, पराक्रमशाली युधामन्यु, वीर्यवान् उत्तमौजा, सुभद्रा का पुत्र अभिमन्यु तथा द्रौपदी के पाँच पुत्र-ये सभी महारथी हैं।

 

7)अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम । नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते।॥७॥

 

विप्रवर ! हमारे पक्ष में जो विशिष्ट वीर हैं उन्हें भी आप जान लीजिये। मेरी सेना के जो अधिपति हैं उन्हें आपके परिज्ञान के लिये मैं बताता हूँ।

 

8)भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः। अश्वत्थामा विकर्णश्च सोमदत्तिस्तथैव च ।।८।। 

9)अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः । नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ।।९।।

 

आप और भीष्म तथा कर्ण और रणविजयी कृपाचार्य एवं अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त के पुत्र भूरिश्रवा यथा और भी अनेकों वीर मेरे लिये प्राण निछावर करने के लिये तत्पर हैं। ये नाना प्रकार के शस्त्रों से सन्नद्ध हैं और सभी युद्ध करने में कुशल हैं।