पूज्य श्री उड़िया बाबा जी द्वारा गीता सार
(श्लोक 10 से 16 प्रथम अध्याय )
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्। पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ।।१०।। अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः । भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ।।११।।
अर्थ
भीष्मपितामह से रक्षित जो हमारी सेना है वह अपरिमित है और इन पाण्डवों की भीम से संरक्षित सेना परिमित (सीमित) है। [ हमारी विजय बहुत कुछ भीष्म के अधीन है] इसलिये अपनी-अपनी नियुक्ति के अनुसार अपने-अपने मोर्चों पर रहकर आप सभी लोग भीष्मपितामह की ही रक्षा करें।
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तस्य संजनयन्हर्ष कुरुवृद्धः पितामहः । सिंहनादं विनद्योच्चैः शंख दध्मौ प्रतापवान् ।।१२।।
अर्थ
प्रतापी कुरुवृद्ध पितामह ने दुर्योधन को प्रसन्न करते हुए उच्च स्वर में सिंहनाद करके शंख बजाया।
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ततः शंखाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः। सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ।।१३।।
अर्थ
इसके पश्चात् शंख, भेरी, मृदंग, नगाड़े, ढोल और रणसिंगे आदि सभी बाजे एक साथ बजाये जाने लगे। यह उनका बड़ा भारी शब्द हुआ।
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ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ । माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः ।।१४।।
अर्थ
तब सफेद घोड़ों से युक्त विशाल रथ में बैठे हुए श्रीकृष्ण और अर्जुन ने भी अपने दिव्य शंख बजाये।
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पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः। पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खः भीमकर्मा वृकोदरः ।।१५।। अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः। नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ।।१६।।
भगवान् श्रीकृष्ण ने पाञ्चजन्य, अर्जुन ने देवदत्त, भीमकर्मा भीमसेन ने पौण्ड्र नाम का विशाल शंख, कुन्तीपुत्र महाराज युधिष्ठिर ने अनन्तविजय तथा नकुल-सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नाम के शंख बजाये।
