भागवतका उद्देश्य एवं माहात्म्य क्रमसंख्या -1

भागवतका उद्देश्य एवं माहात्म्य

क्रम संख्या -1

भगवान सुखदेव जी की उत्कृष्ट रचनाओं में से एक है श्रीमद् भागवत पुराण,

 भगवान कृष्ण की लीलाओं और जीवन के सर को वर्णित करता है यह महापुराण भगवान कृष्ण स्वयं कहा है कि कलयुग में 

 मैं स्वयं विराजमान रहूंगा इस भागवत महापुराण के रूप में, 

 श्रीमद् भागवत पुराण के पठन-पाठन और श्रवण से न सिर्फ मोक्ष की प्राप्ति होती है अपितु भगवान कृष्ण की शरण प्राप्त कर भक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है 

इसके माहात्म्यका प्रतिपादन स्वयं वेदव्यासजीने पद्मपुराणके उत्तरखण्डमें किया है, जो श्रीसूतजी और श्रीशौनकजीके संवादके रूपमें प्रस्तुत है,

श्रीमद्भागवत कथा के प्रारम्भ करने से पूर्व इस माहात्म्य के पाठ एवं श्रवण की विधि है। वेदव्यासजी ने माहात्म्य के अन्तर्गत भागवत कथा की महत्ता बताते हुए मानव-जीवन में इससे प्राप्त होनेवाले लाभ की चर्चा की है। माहात्म्यमें छः अध्याय हैं।

 

 

 

इस  मे बारह स्कन्ध और १८००० (अठारह हजार) श्लोक हैं। श्रीमद्भागवत माहात्म्यका प्रथम श्लोक है-

सच्चिदानन्दरूपाय

 

विश्वोत्पत्त्यादिहेतवे।

 

तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वर्य नुमः ॥

 

अर्थात सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान श्रीकृष्णको हम नमस्कार करते हैं, जो जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और विनाशके हेतु तथा आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक-तीनों प्रकारके तापोंका नाश करनेवाले हैं।

 

ये जो संसार है, इसको बनानेवाला ईश्वर है। इसकी स्थिति भी उसीसे है और इसके विनाश (विलय)-का हेतु भी परमात्मा ही है अर्थात् संसारका आधार परमात्मा है, उसीके कारण जगत्की सत्ता है। वह भगवान् सत्, चित्, आनन्दस्वरूप है। संसारके जो दुःख-ताप हैं, क्लेश-कष्ट हैं, उनका शमन करनेवाला भी परमात्मा ही है।

 

इस प्रथम श्लोकमें ही ग्रन्थकी विषय-वस्तु स्पष्ट हो गयी है, तदनुसार इस संसारका अस्तित्व एवं इसकी सत्ता परमात्मासे है (सत्)। जगत्में जो चेतना है, वह भी परमात्मा है (चित्) और प्राणियोंके अन्तःकरणमें जो आनन्दका सागर लहरा रहा है, वह भी परमात्मा ही है (आनन्द)। भगवान्‌का स्वरूप सत्-चित्-आनन्दमय है, वे ही संसारके निर्माता, पालक एवं संहारक हैं और वे ही सभी प्रकारके कष्टोंके विनाशक हैं अर्थात् जीव और जगत्के प्रणेता एवं नियन्ता भगवान् ही हैं। इस सत्यको आनकर मनुष्यमें उस परमात्माको जाननेकी जिज्ञासा जागनी आहिये, उसके स्वरूपको जानने-समझनेका विचार उसके

 

कर आना चाहिये: क्योंकि वही तो जीव स्वयं भी है (तत्त्वमसि सोऽहम्’)। परमात्माको जानकर ही व्यक्ति स्वयंके बरिमें ज्ञान प्राप्त कर सकता है और स्वयंके बारेमें ज्ञान प्राप्त करना (आत्मज्ञान) ही मनुष्यके जीवनका परम

लक्ष्य है। अतएव भागवत जीव, जगत् एवं जगदीश्वरके सम्बन्धमें पूर्ण ज्ञान प्रदान करनेवाला महान् कल्याणकारी ग्रन्थ है।

 

भगवान् श्रीकृष्णने भागवतका माहात्म्य बताते हुए ब्रह्माजीसे कहा है-

 

यः पठेत् प्रयतो नित्यं श्लोकं भागवतं सुत। अष्टादशपुराणानां फलमाप्नोति मानवः ॥ीम

 

धागड (स्कन्दपुराण , वैष्णवखण्ड, मार्गशीर्षमाहात्म्य १६ । ३३)

 

पुत्र ! जो प्रतिदिन पवित्रचित्त होकर भागवतके एक श्लोकका पाठ करता है, वह मनुष्य अठारह पुराणोंके पाठका फल पाता है। कलियुगमें जहाँ-जहाँ पवित्र भागवतशास्त्र रहता है, वहाँ-वहाँ सदा ही मैं देवताओंके साथ उपस्थित रहता हूँ और जहाँ-जहाँ भागवत कथा होती है, वहाँ-वहाँ मैं उसी प्रकार जाता हूँ, जैसे पुत्रवत्सला गौ अपने बछड़ेके पीछे-पीछे जाती है म

 

यत्र यत्र भवेत् पुण्यं शास्त्रं भागवतं कलौ। तत्र तत्र सदैवाहं भवामि त्रिदशैः सह ।

 

यत्र यत्र चतुर्वक्त्र श्रीमद्भागवतं भवेत् । गच्छामि तत्र तत्राहं गौर्यथा सुतवत्सला ॥

 

सूतजीने शौनकजीको भागवतकी महिमा बताते हुए कहा है-

 

विद्यते । एतस्मादपरं किञ्चिन्मनः शुद्धयै न

 

जन्मान्तरे भवेत्पुण्यं तदा भागवतं लभेत् ॥

 

(पद्मपुराणोक्त भागवतमाहा० १।१२)

 

मनकी शुद्धिके लिये इससे बढ़कर कोई साधन नहींहै 

 भागवत-कथा-से सम्बद्ध तीन संवाद हैं- (१) सूतजी शौनकजीका, (२) सनकादि-नारदका, (३) शुकदेव परीक्षित्का। इनमें प्रमुख संवाद शुकदेव-परीक्षित्का है।

 

पद्मपुराणोक्त भागवत-माहात्म्यमें शौनकजी सूतजीसे पूछते हैं कि भक्ति, ज्ञान, वैराग्यकी प्राप्तिका कोई सरल उपाय बताइये। कोई ऐसा साधन बताइये, जिससे इस कलिकालके

पापोंसे मुक्त होकर व्यक्ति मोक्ष प्राप्त कर सके। तब सूतजीने कहा कि मनुष्यको समस्त पापोंसे मुक्ति दिलाकर मोक्ष प्रदान करनेवाला शास्त्र भागवत पुराण है। सूतजीने शौनकजीसे इसकी महिमाका बखान किया और कहा कि अब मैं आपको वह कथा सुनाता हूँ, जो सनकादि ऋषियोंने नारदजीको सुनायी थी।

 

श्रीमद्भागवत-माहात्म्यके प्रसंग में भक्ति के कष्ट- निवारण की कथा 

 

एक बार चारों ऋषि (सनकादि) विशालापुरीमें पधारे हुए थे, वहाँ उन्होंने नारदजीको देखा। नारदजीका मुख बहुत म्लान और उदास था। मुनियोंने उनसे इसका कारण जानना चाहा। नारदजी बोले- ‘मैं सर्वोत्तम लोक समझकर पृथ्वीलोकमें गया था, पर वहाँ मुझे बड़ी अद्भुत स्थिति देखनेको मिली। मैं सारे तीर्थोंमें घूमा, पर कहीं भी मुझे ता शान्ति नहीं मिली। वहाँ चारों ओर पाप एवं अधर्मका बोलबाला है, जीव केवल अपना ही पेट पालनेमें लगे हैं। वे असत्यभाषी और आलसी हो गये हैं। स्त्री-पुरुषोंमें कलह मचा रहता है। पृथ्वीपर विचरता हुआ मैं यमुना-तटपर पहुँचा तो वहाँ मैंने देखा कि एक युवती स्त्री दुःखी मनसे बैठी है, उसके पास दो वृद्ध पुरुष अचेत अवस्थामें पड़े हैं, जिन्हें वह बार-बार होशमें लानेका प्रयत्न कर रही है, पर उन्हें होश नहीं आ रहा है। मुझे देखकर वह तरुणी स्त्री खड़ी हो गयी और प्रार्थना करने लगी कि मेरे इन पुत्रोंको होशमें ला दीजिये, मैं बहुत दुःखी हूँ। नारदजीके पूझनेपर उसने बताया कि मैं भक्ति हूँ, ये दोनों मेरे बेटे ज्ञान और वैराग्य हैं। समयके फेरसे ये जर्जर हो गये हैं। मैं (भक्ति) द्रविड़ देशमें जन्मी, कर्नाटकमें बढ़ी,

कहीं-कहीं महाराष्ट्रमें सम्मानित हुई, पर गुजरातमें मुझक बुढ़ापेने आ घेरा। अब जबसे मैं वृन्दावन आयी हूँ, तब सुन्दरी रूपवती युवती हो गयी हूँ, किंतु मेरे पुत्र अभी भी उसी अवस्थामें हैं। आप कुछ उपाय कीजिये, जिससे के स्वस्थ, चेतन एवं तरुण हो जायें। नारदजीने उन दोनोंको वेदध्वनि, वेदान्तघोष और बार-बार गीता-पाठ करके जगाया, इससे उनमें थोड़ी-सी चेतनता आयी; किंतु वे फिर निस्तेज होकर गिर पड़े। इसपर नारदजी बड़े चिन्तित हुए कि अब क्या किया जाय। इसी समय आकाशवाणी हुई कि तुम सत्कर्म करो, पर इसका आशय नारदजीकी समझमें नहीं आया। नारदजी वहाँसे चल दिये और मार्गमें मिलनेवाले मुनीश्वरोंसे वह साधन पूछने लगे, पर किसीसे कुछ बताते नहीं बना। तब नारदजी बदरीवन आये और तप करनेका विचार करने लगे, इतनेमें ही सामने उन्हें सनकादि ऋषि दिखायी दिये। नारदजीने कहा- मुनिवरो ! बड़े भाग्यसे आपका समागम हुआ है। नारदजीने उन्हें अपनी समस्या बतायी। सनकादिने कहा आप चिन्ता न करें। भागवत महापुराण सुननेसे भक्ति, ज्ञान, वैराग्यको बल मिलेगा। इसके बाद नारदजीके साथ सनकादि भी श्रीमद्भागवत-कथामृतका पान करने गंगातटपर आये। भागवत कथाका समाचार पाकर सभी ऋषि-मुनि दौड़-दौड़कर वहाँ पहुँचे। इसके अतिरिक्त वेद, वेदान्त (उपनिषद्), सभी पुराण एवं छहों शास्त्र भी मूर्तिमान् होकर वहाँ उपस्थित हुए।

 

सनकादि नारदजीके दिये हुए आसनपर विराजमान हुए और भागवत-कथाका माहात्म्य सुनाने लगे। वे बोले-नारदजी ! भागवत-कथाके श्रवणमात्रसे मुक्ति हाथ लगती है। भागवतमें अठारह हजार श्लोक हैं और यह शुकदेव-

परीक्षित्का संवाद है। जिस घरमें नित्यप्रति भागवत कथा होती है, वह घर तीर्थरूप हो जाता है। जो लोग उसमें रहते हैं, उनके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य अन्त ये समयमें भी भागवत सुन लेता है, उसे प्रभु वैकुण्ठधाम दे कोदेते हैं। जब करोड़ों जन्मोंके पुण्य उदय होते हैं, तभी भागवतकी प्राप्ति होती है कमी

‘कोटिजन्मसमुत्थेन पुण्येनैव तु लभ्यते ॥’

 

भागवतकी महत्ता सुनकर शौनकजीने पूछा- सूतजी ! भागवत मोक्षकी प्राप्तिमें सभी साधनोंसे आगे कैसे बढ़ गया ? तब सूतजीने कहा कि भगवान् श्रीकृष्ण जब अपने में स्वधामको पधारने लगे तो उद्धवने उनसे कहा कि आप तो जा रहे हैं, अब इस घोर कलिकालमें साधु, सन्त, प सज्जनोंकी रक्षा कौन करेगा और उनके जीवनका सहारा क्या होगा ? इसलिये आप उनके हितमें यहाँसे न जाइये । इसपर भगवान् सोचने लगे कि भक्तोंके अवलम्बनके लिये मुझे क्या व्यवस्था करनी चाहिये। तब भगवान्ने अपनी सारी शक्ति श्रीमद्भागवतमें रख दी और वे अन्तर्धान होकर इस भागवत-समुद्रमें प्रवेश कर गये-

 

 

स्वकीयं तिरोधाय प्रविष्टोऽयं

 

यद्भवेत्तेजस्तच्च भागवतेऽधात् । श्रीमद्भागवतार्पणम् ॥

 

इसलिये यह भागवत भगवान्की साक्षात् शब्दमयी मूर्ति है, यह भगवान्‌का वाङ्मयस्वरूप है। इसके पठन, श्रवण, दर्शनसे मनुष्यका मन निर्मल होता है और उसमें भक्तिका उदय होता है, जो सब प्रकारसे मनुष्यका कल्याण करती है। फिर सूतजी बोले- शौनकजी ! जिस समय सनकादि मुनीश्वर ग्रन्थ-महिमा बता रहे थे, तब उस सभामें एक बड़ा आश्चर्य घटित हुआ। वहाँ तरुणावस्थाको प्राप्त हुए

दोनों पुत्रोंके साथ विशुद्ध प्रेमस्वरूपा भक्ति भगवन्नामोंक उच्चारण करती हई प्रकट हो गयीं। सनकादिने कहा कि ने भक्तिदेवी कथाके प्रभावसे ही यहाँ प्रकट हुई हैं। भक्तिदेवी सनकादिसे बोलीं- आपने कथा सुनाकर मुझे फिर पुष्ट कर दिया है, अब मैं कहाँ रहूँ? तब मुनीश्वरोंने कहा- ‘देवि! तुम भक्तोंके हृदयमें निवास करो।’ यह सुनकर भक्ति तुरन्त भक्तोंके हृदयमें जा विराजीं। भक्तिके वश होकर भगवान भी भक्तोंके पास खिंचे चले आते हैं। भक्ति प्राप्त करनेका सबसे उत्तम साधन भागवत कथामृतका पान करना है कलियुगमें यह सर्वोत्तम साधन है।

 

फिर सूतजीने कहा कि कथाके समय भक्तिका प्रादुर्भाव हुआ देख भगवान् श्रीकृष्ण भी अपने अलौकिक अलंकरण धारण किये हुए परमसुन्दर रूपमें अपने धामको छोड़ वहाँ पधारे। भक्तोंने उनके दर्शनकर उनकी रूप-माधुरीका अपलक नेत्रोंसे पान किया। देखते-ही-देखते वे मुरलीमनोहर सब भक्तोंके हृदयमें विराज गये। सभीको देह-गेहकी सुधि भूल गयी और एक अनिर्वचनीय आनन्दके सिन्धुमें वे सब डूब गये। ऐसा अद्भुत आनन्द रस बरसता है भागवतके सप्ताह-पारायण महायज्ञमें। सनकादिने कहा कि इस कथाके श्रवणसे मनुष्य बड़े-से-बड़े पापोंसे मुक्त हो पूर्णतः पवित्र हो जाते हैं। इस प्रसंगसे दो महत्त्वपूर्ण तथ्य उजागर होते हैं- एक तो यह कि तरुणावस्थामें ही जो तरुण उत्साहहीन, उमंगहीन हो वृद्धों-जैसे दिखने लगते हैं और जीवनमें हताशा-निराशाके जालमें फँस जाते हैं, उन्हें केवल शास्त्रोंके ओजस्वी वचन सुनाकर ही जगाया जा सकता है। शास्त्र ही उनमें तरुणाईका पुनः संचार कर सकते हैं। इसलिये तरुणों एवं युवकोंको आध्यात्मिक ग्रन्थोंका स्वाध्याय

करना चाहिये। दूसरा महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि भगवान्‌का सान्निध्य, उनका अनुग्रह भक्तिसे ही प्राप्त किया जा सकता है। भक्तिसे भगवान् भक्तके हृदयमें आ विराजते हैं।