महाराज जी (परम पूज्य उड़िया बाबा जी महाराज) और परमपूज्य श्रीहरिबाबा जी महाराज

shrihari baba ji udiya baba gi
“बाबा हृदय को पकड़ना जानते थे और उसे निभाना भी।”

पीछे आपका संग पूज्यपाद श्रीहरिबाबाजी के साथ हो गया। यों कुछ परिचय तो पहले भी हो चुका था, परन्तु प्रधानतया इन दोनों महापुरुषोंका समागम बाँध बँधने के पीछे ही हुआ और फिर ऐसा हुआ कि दोनों मिलकर एक हो गये । जैसे निमाई और निताई दोनों घुल-मिल गये थे उसी प्रकार ये दोनों भी अन्योन्याश्रित भाव-से एक बन गये। भक्तगण हरि-हरात्मक भावसे इनकी पूजा करते थे। बाबा श्रीहरिबाबाजी की अपेक्षा ६-१० वर्ष बड़े थे । अतः यह उनमें पूज्यबुद्धि रखते थे। वे भी इनका अत्यन्त संकोच करते थे। स्वयं श्रीहरिबाबाजी कहते थे कि जबसे हम मिले दोनों में कुछ ऐसा संकोच का सम्बन्ध हो गया कि कभी घुल-मिल ही न सके । उन्होंने कभी मेरे सामने उपदेश नहीं दिया, कथा नहीं कहीं। मैं पहुंच जाता और वे कुछ कर रहे हों तो मुझे देखकर चुप हो जाते । मुझे कभी कोई आदेश या उपदेश नहीं दिया, सर्वथा मेरा रुख देखकर ही बातें कीं ।

मैंने तो अपनी आंखों से सब प्रत्यक्ष देखा है। श्रीहरि बाबाजी और उनके स्वभाव में, रहन-संहन में एवं व्यवहार मैं पृथ्वी-आकाश का सा अन्तर था। वे प्रवृत्ति के कार्यों से घबराते थे; इनका सब कार्य लोकहित के निमित्त जनसमूह में ही होता था । वे समय का कोई विशेष विचार नहीं रखते थे; जब तक चाहें उपदेश देते रहें, जब तक चाहें बात करते रहें; परन्तु इनके सभी कामों का पल-पल बँधा रहता था। ये सब काम बड़ी देखकर करते थे। व भक्तों के साथ हँसते-खेलते थे, उनके सुख-दुःख की बातें पूछते और घर-गृहस्थी-के विषय में भी सम्मति देते थे; इनके चाहे कोई मरो चाहे जीओ नीची दृष्टि करके कथा में बैठे रहना, कुच पढ़कर सुना देना, कीर्तन कर लेना और फिर किबाड़ बन्द करके बैठ जाना। कोई आओ, कोई ‘जाओ, किसी से व्यवहार की बातें ही नहीं। न मिलना, न जुलना । उनकी पूर्णतया अद्वैत वेदान्त में निष्ठा थी, ये भक्तिपथ के पथिक हैं। इस प्रकार की विषमतायें होने पर भी दोनों एक हो गये । श्री उड़िया बाबाजी जब तक न पहुंचते तब तक बांध का उत्सव होता ही नहीं था। महाराज ने अपनी सब इच्छायें श्रीहरि बाबाजी-की इच्छा में मिला दी थीं। जितना उन्होंने निभाया उतना कोई निभा नहीं सकता। वे सदा श्रीहरि वावाजी की भाव-भंगी देखा करते थे । इन्हें किसी बात से कष्ट न हो यही चिन्ता उन्हें सदा वनी रहती थी। इन तक वे किसी बात को सूचना नहीं पहुँचने देते थे । कीर्तन ठीक न होता और श्रीहरि बाबाजी के चित्त में दुःख हो जाता तो वे सभी को बुलाते, समझाते और इन्हें प्रसन्न करने का प्रयत्न करते आने-जाने वालों की सारी देख-रेख उन्हीं पर थी। श्रीहरि-बाबाजी तो यह भी नहीं जानते थे कि कौन आया और कौन गया ।
कहां से रुपया आया, किसने दिया और क्या व्यय हुआ; इन सबकी सार सँभार वे स्वयं ही करते थे। श्रीहरि बाबाजी तो केवल कह भर देते थे कि यह होना चाहिये। उनके समस्त कार्य दूसरों के उपकार-के निमित्त होते थे, या अङ्गीकार किये हुए के प्रतिपालन के निमित्त । जिसे उन्होंने ‘अपना कहकर स्वीकार कर लिया, फिर उसकी चाहे कोई कितनी भी बुराई करे, वे उसे त्यागते नहीं थे । दोष देखते हुए भी वे उसकी ओर ध्यान नहीं देते थे। इतनी अदोष दृष्टि दूसरे स्थान पर मिलनी कठिन है। पहले इस प्रकार के संकीर्तन या सत्संग-महोत्सव नहीं होते थे, बांध के उत्सवों के पश्चात् ही सर्वत्र इनका प्रचार हुआ ।
उत्सवों में
मेरे ऊपर तो आपकी अत्यन्त अनुकम्पा थी। जैसे पिता पुत्र की बातों को मान लेता है उसी प्रकार वे मेरी सब बातों को मान लेते थे । अलीगढ़ में सर्वप्रथम वृहद् संकीर्तनोत्सव हुआ । उस उत्सव को सफल करने में रामस्वरूपजा केला का बड़ा हाथ रहा । उनकी इच्छा थी कि आज-कल जितने भी बड़े-बड़े महात्मा हैं सभी इस उत्सव में बुलाये जायें। प्रायः सभी पधारे भी थे। वृन्दावन के सु-प्रसिद्ध गोस्वामी श्री बालकृष्णजी, श्री उड़िया बाबाजी, श्रीस्वामी एकरसानन्दजी, श्री स्वामी कृष्णानन्दजी (मण्डली वाले) श्री जय-रामवास जी ‘दीन’ तथा और भी उस समय जितने संत थे आज उनमें से एक भी साकार रूप में इस पृथ्वी पर नहीं हैं। श्री हरि बाबाजी भी पधारे थे। वहाँ की सेवा का भार मुझ पर भी था । मैं स्वामी एकरसानन्द को लेकर महाराज उड़िया बाबा के पास गया । स्वामी-जी वयोवृद्ध थे और उनके साथ उनके बहुत-से प्रसिद्ध शिष्य भी थे। महाराज का स्वभाव था वह किसी को देखकर न तो उठते थे और न प्रणाम करते थे । वे चौकी पर बैठते थे। सो बैठे रहे। स्वामी एकरसानन्दजी भी जाकर बंठ गये। दोनों महापुरुषों में बड़ी  तक बातें होती रही । कोई वात नहीं, तथापि मैंने अनुभव किया कि कुछ लोगों को यह बात अच्छी नहीं लगी कि महाराज ने स्वामी जी को अभ्युत्थान नहीं दिया। यह एक अपूर्व सम्मेलन था, मेरी इच्छा थी कि यहाँ किसी बात पर कटुता न होने पावे। मैं महाराज के समीप गया और बोला, “महाराजजी आपको स्वामी एकरसानन्द के पास चलना चाहिये ।” आप तुरन्त उठ पड़े और बोले, “चलो।” हम गये और महाराज वहाँ स्वामीजी के तख्त के नीचे जाकर बैठ गये । स्वामीजी ने ऊपर बैठने को बहुत कहा, किन्तु ऊपर नहीं बैठे । इसका सभी पर बड़ा प्रभाव पड़ा। सारांश यह कि उनके मन में कभी किसी प्रकार के मान-अपमान का भाव नहीं था। सदा अपने आनन्द में मग्न रहते थे। हम जहां के लिये प्रार्थना करते तुरन्त ‘हाँ’ कर लेते थे ।
कुछ लोगों के कहने से मैंने एक बार फर्रुखाबाद मैं एक महो-त्सव का आयोजन किया। मैं वहां की भीतरी बातों से परिचित नहीं था । श्रीहरि बाबाजी और श्री उड़िया बाबाजी दोनों से प्रार्थना की और दोनों ने स्वीकार कर ली। महाराज पैदल चलकर पहुँचे । किन्तु वहां आपस में ही विरोध हो गया। जैसा चाहिये था वैसा उत्सब नहीं हुआ । मुझे बड़ी लज्जा लगी और ज्वर भी आ गया । आपने कहा, “कोई बात नहीं, ऐसा तो होता ही है। साधुओं के लिये मान-अपमान क्या ? प्रसंग बहुत बड़ा है। मेरे कहने का तात्पर्य तो इतना ही है कि आप कभी किसी के दोष की ओर ध्यान नहीं देते थे तथा मान-अपमान और सुख-दुःख में सदा समभाव से रहते थे ।
जब झूसी में चौदह महीने का अखण्ड संकीर्तन एवं साधनानुष्ठान हुआ तब मैंने आपसे पधारने की प्रार्थना की। ढाई-तीन सौ कोस थीं। आपने मेरी पैदल चलकर आना कोई सामान्य वात नहीं प्रार्थना सहर्ष स्वीकार कर ली और रामघाट से पैदल चलकर आए झूसी पधारे। जहाँ तक मुझे स्मरण है जब से आप रामघाट आये तब से यही एक काशी-प्रयाग की उनकी यात्रा सबसे प्रथम औन अन्तिम थी। यहां आपने प्रायः दो-ढाई महीने निवास किया। यह हमने आपके लिये जो फूस की कुटिया बनवायी थी उसका चिक अभी तक ज्यों का त्यों मेरी आँखों के सामने नृत्य कर रहा है। उस स्थान को देखकर अब भी मेरा हृदय भर आता है। आप यहां बन प्रसन्न रहे। आपने अत्यन्त अनुराग प्रदर्शित किया । आप दर्शकों बिना आसन के सर्वसाधारण लोगों के साथ बैठ जाते और दूस लोग गद्दी-तकिया लगाकर आसनों पर बैठते । आप नीचे बैट बैठे सुनते रहते । आपने कभी अपना अपमान अनुभव नहीं किया कुछ मण्डलेश्वर आये । वे गद्दा-तकिया लगाये बैठे थे । आप साध रण व्यक्ति की भांति आगे भूमि पर जाकर बैठ गये। किसी ने कह “आसन दो।” आपने कहा, “आसन की क्या आवश्यकता है, पृथ्व ही आसन है ।”
यहां से आप काशी गये । विश्वनाथ जी के दर्शन करके आप कहा, “अभी आधे विश्वनाथ जी के दर्शन हुए हैं। आधे तब होंगे ज मालवीयजी के दर्शन हों। आप विश्वविद्यालय गये । मालवीय के बंगले में जाकर खिड़की से झांका। वे आराम कर रहे थे आपने कहा, “आराम करने दो।” किसी ने मालवीय जी को सूच दे दी। वे मिलने को उत्सुक थे। सुनते ही दौड़ आये। द महापुरुष एक दूसरे से परस्पर लिपट गये और प्रेम के आँसू बह लगे । काशी से लौट कर आप फिर झूसी आये तथा अनुष्ठान सम कर सबको साथ ले रामनवमी के अवसर पर श्री अयोध्या जी गये
उन दिनों लखनऊ में राष्ट्रीय महासभा (काँग्रेस) का अधिवेशन होने वाला था। हम सबके कहने पर आप लखनऊ भी पधारे। वहाँ महात्मा गांधी से भी भेंट की। महात्मा जी आपके त्याग-वैराग्य को देखकर बहुत प्रभावित हुए। लखनऊ में आपको जो भी अपने घर भिक्षा के लिये बुलाता वहीं उसकी प्रसन्नता के लिये चले जाते थे । कई बार तो एक-एक दिन में साठ-साठ, सत्तर-सत्तर घरों में भिक्षा करते थे। कभी-कभी मैं भी साथ जाता था । परन्तु मैं तो ऊबकर लौट आता, तथापि आप सबका मन रखते । आप दूसरों का कष्ट नहीं देख सकते थे । भूख न होने पर भी यदि कोई आग्रह करता तो उसे प्रसन्न करने के लिये खा लेते थे। स्वयं कष्ट उठा लेते, किन्तु दूसरे का कष्ट नहीं देख सकते थे। इन्हीं कारणों से पीछे आपका पेट भी बिगड गया ।
आश्रम
जिन दिनों श्रीवृन्दावन में मैं श्रीकृष्णलीला दर्शन लिख रहा था, उस समय मैंने आपसे वृन्दावन पधारने की प्रार्थना की। आप वहाँ पधारे और वहीं कुछ भक्तों ने एक छोटी-सी कुटिया बनाने का प्रस्ताव रखा। मैंने इसका विरोध किया। किन्तु मेरा तो एक ही मत था । बहुमत के सामने वह अमान्य हो गया । संयोग की बात कुटिया बन गयी और फिर शनैः शनैः उसका विस्तार हो गया । रामघाट, कर्णवास आदि स्थानों में भी श्रीमहाराज के भक्तों ने उनके नाम से आश्रम बनवाये। महाराज की इन सबमें आसक्ति तो क्या होनी थी, किन्तु इस प्रवृत्ति के विस्तार से भिन्न प्रकृति के लोग एकत्रित हो गये । महाराज अङ्गीकार करना तो जानते थे, किन्तु अङ्गीकार करके त्यागना उनकी प्रवृत्ति के विरुद्ध था । प्रवृत्ति में ऐसा होता ही है, इसमें किसी का दोष नहीं ।
महापुरुषों की समस्त चेष्टायें लोक-कल्याण के निमित्त होती है। यह संसार तो असुख है, अनित्य है। सदा से यह ऐसा रहा है और रहेगा भी। महापुरुष आते हैं, अपने स्वभाव से इसे सुखमय बनाने के लिये । परन्तु फिर भी यह ज्यों-का-त्यों हो जाता है। कुत्ते की पूछ को चाहे जितने दिन कसकर सीधी बाँधो, खोलोगे तो फिर टेड़ी-की-टेड़ी। न जाने कितनी बार भगवान् ने इस अवनि पर अवतार लिया, फिर भी संतार से दुःख का अत्यन्ताभाव नहीं हुआ । यह संसार दुखःमय ही बना रहा यह नहीं, इसमें आकर बड़े-बड़े अवतारों को भी दुःख सहन करने पड़े । जिसका संसार के साथ सम्बन्ध हुआ, ऐसा कौन है जिसे संसार ने अपयश का पुरस्कार न दिया हो। जितने महापुरुष हुए हैं सभीने अस्त्रों के द्वारा, विषके द्वारा या अन्य व्यवहारों के द्वारा ही अपने प्राणों का नरित्याग किया है। संसारी लोग उनके यथार्थ स्वरूप को भूलकर उन्हें शत्रु समझने लगते हैं और उन पर आक्रमण कर बैठते हैं। वे भी ऐसी ही लीला रचकर शरीर का अन्त करना चाहते हैं। मरते-मरते अपनी मृत्यु से भी वे लोगों को शिक्षा दे जाते हैं । भगवान् बुद्ध, श्री शंकराचार्य तथा अन्य आचार्यों पर भी संसारी लोगोंने आक्रमण किये तथा विष के प्रयोग किये । महात्मा पल्टू को जीवित ही जलाया गया था । इन बातों में कोई न कोई रहस्य होता है । हम अल्पज्ञ प्राणी उसे समझ नहीं सकते । महात्मा गान्धी यदि साधारण मृत्यु से मरते तो उनका सुयश इस प्रकार दिग्-दिगन्तमें व्याप्त न होता। उन्होंने गोली से मरकर बहुत बड़ा कार्य किया । श्री उड़िया बाबाजी कहते थे, “जब मैंने महात्माजी की मृत्यु की बात सुनी तब मैं मुक्तकण्ठसे ढाह मारकर रोने लगा।”
कौन जानता था, आप भी ऐसी ही मृत्यु से अपने इस पाञ्चभौतिक शरीर का अन्त करेंगे ।
इधर कुछ दिनोंसे आप बहुमूत्र रोग से पीड़ित थे पैर की नस में भी कुछ सूजन आ गयी थी। इससे चलने में भी कुछ कष्ट होता था । फिर भी आप चलते ही थे। गत वर्ष के माघ मास में अर्द्ध कुम्भी थी । उत्त समय श्रीहरिबाबाजी प्रायग पधारे थे । यहाँ से माँ श्री आनन्द-मयी को वे बाँध के उत्सव पर ले गये थे। पूज्य बाबा इस उत्सव में पधारने वाले थे । किन्तु अस्वस्थता के कारण न आ सके। उनके बिना श्री हरिबाबाजी उत्सव करते ही नहीं थे। जब नियत तिथि पर नहीं पधारे तब श्री माँ को लेकर श्री हरिबाबाजी महाराजजी के पास वृन्दावन पहुंचे । बाबा के लिये महाराजजी सब कुछ करने को तैयार रहते थे। उन्हीं के लिये वे घड़ी रखने लगे और यथासाध्य समय से ही कथा कीर्तनादि के कार्यक्रमों में सम्मिलित होने लगे । फिर भी पैदल चलने के नियम को वे अब भी निभाते थे। इसके लिये श्री हरिबाबाजी ने कभी आग्रह भी नहीं किया। अबकी बार उन्होंने बल देकर कहा, “आपके लिये नियम-फियम क्या ? आप मोटर पर चलें । आपके बिना उत्सव नहीं होगा। श्रीमाँ ने भी उनके कथन का समर्थन किया। बस, आप मोटर द्वारा बांध गये। यही सवारी द्वारा आपकी प्रथम यात्रा थी। बाँध के उत्सव के पश्चात् श्री हरि बाबाजी तो माँ के साथ नैनीताल, अल्मोड़ा चले गये और महा-राज वृन्दावन आकर निवास करने लगे ।
गर्मियों के पश्चात् आषाढ़ मास में श्री हरिबाबाजी काशी होते हुए झूसी पधारे और एक वर्ष तक यहाँ संकीर्तन भवन में निवास करनेका विचार किया। कार्तिक तत प्रायः पाँच महीने आप रहे भी । आपके बिना श्रीउड़िया बाबाजी का मन बहुत उदास रहता था । अतः
आपको बुलाने के लिए उन्होंने चार-पाँच बार आदमी भेजे । किन्तु आप यहाँ से नहीं गये । कहला दिया, ‘मेरा एक वर्ष तक वहीं रहने का संकल्प है’।
जब कार्तिक में आपने महाराज की विशेष अस्वस्थता का समाचार सुना तो आपसे झूसी में नहीं रहा गया। आप माताजी को साथ लेकर मार्गशीर्ष में वृन्दावन चले गये। वहां जाकर यह निश्चय हुआ कि श्री उड़िया बाबाजी, श्रीहरि बाबाजी और माँ श्री आनन्दमयी सब मिलकर दिल्ली, कुरुक्षेत्र, अम्बाला, खन्ना और होशियारपुर होते हुए कांगड़ा-ज्वालामुखी की मोटरों द्वारा यात्रा करें और फिर होलीपर लौटकर वृन्दावन में उत्सव हो। इस निश्चय के अनुसार प्रायः सौ भक्तों के सहित तीनों ही दिल्ली आदि होते खन्ना पहुँचे । वहां महा-राज श्री उड़ियाबाबाजी को ज्वर आ गया। स्वास्थ्य तो पहले भो अच्छा नही था । अतः आगे की यात्रा स्थगित करके सब वृन्दावन आ गये और सबने मिलकर वहीं होली का उत्सव किया ।
मैंने श्रीहरि बाबाजी से प्रार्थना की थी कि आप हमें बीच ही में छोडकर चले गये थे। अतः इस चैत्र के नवसंवत्सरोत्सव में अवश्य पधारें । आपने उत्तर दिया, “भाई ! हम तुम्हारे ही काम से वृन्वावन गये हैं। श्री बाबा को लेकर हम चैत्र के उत्सव में अवश्य आयंगे और अधिक से अधिक रहेंगे। इस बात से मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई और हम बड़े उत्साह से उत्सव का विशेष आयोजन करने लगे। पीछे समाचार मिला कि श्री उड़िया बाबाजी का स्वास्थ्य अच्छा नहीं है, अतः वे न पधार सकेंगे । अकेले श्रीहरि बाबाजी पधारेंगे। हम लोग बड़ी तैयारियां कर रहे थे । हमारी हार्दिक इच्छा थी कि महाराज पधारें। किन्तु जब स्वास्थ्य की बात सुनी तो हमने आग्रह करना उचित न समझा ।
चैत्र कृष्णा त्रयोदशी रविवार को सायंकाल में पूज्यपाद श्रीहरि बाबाजी अकेले ही जाने की सहर्ष अनुमति दे दी। उन्हें पहुंचाने के लिये वे मोटर तक आये, प्रसाद भी दिया और जब तक मोटर चली नहीं तब तक खड़े रहे । इस प्रकार बड़े स्नेह भरित हृदय से विदा दी ।
श्रीहरि बाबाजी चतुर्दशी सोमवार को प्रातःकाल यहाँ पधारे । मङ्गलवार को तार आया कि उड़िया बाबाजी का शरीरान्त हो गया। पढ़कर सभी को आश्चर्य हुआ। श्रीहरि बाबाजी कहने लगे; “मैं तो सकुशल छोड़ आया था।” श्रीमां कहने लगी… कहीं गिर तो नहीं पड़े।’ फिर सोचा- शरीर का क्या पता ? कब इसका अन्त हो जाय ? यह तो क्षणभंगुर है ही। यही सब सोच रहे थे कि दूसरे दिन बुधवार को ‘अमृत बाजारपत्रिका’ में पढ़ा, “उनकी उनके किसीशिष्य ने हत्या कर दी।” यह और भी आश्चर्यजनक बात थी। एक-से-एक आश्चर्य की बात सुनकर सभी चिन्तित, उद्विग्न और खिन्न थे। उसी समय यथार्थ घटना का पता लगाने के लिये एक आदमी वृन्दावनभेजा गया। गुरुवार की रात्रि में उसने सूचना दी, ‘एक पागल से व्यक्ति ने गड़ासा लेकर तीनबार उनके सिर पर प्रहार किया। वहां के सभी लोग अत्यन्त दुःखी हैं, आपकी प्रतीक्षा में हैं। उसी समय श्रीहरि बाबाजी ने वृन्दावन जाने का निश्चय किया और वे चैत्रशुक्ला तृतीया शुक्रवार को यहां से वृन्दावन के लिये चल पड़े ।
इस घटना से मेरे हृदय की क्या दशा हुई यह कुछ कहा नहीं जा सकता । बड़े उत्साह से इन उत्सव की तैयारियां कर रहा था। मुझे अब भी आशा थी कि सम्भव है, श्रीमहाराजजी पीछे से आ जायें ।
दूर-दूर से लोगों को आमन्त्रित किया था । किन्तु सभी उत्साह धूलिमें मिल गया। आश्रम में खिन्नता का वातावरण व्याप्त हो गया । सर्वत्र इसी घटना की चर्चा थी यद्यपि मैं एक विशेष अनुष्ठान में हूँ। कहीं
जाने का नियम नहीं है, प्रयाग भी नहीं जाता। कुटी के संगम तक बस इतना ही इस अनुष्ठान में मेरा संसार है। तथापि महाराज के परलोक प्रयाण की बात सुनते ही मेरी जाने की इच्छा हुई । किन्तु इतने लोग उत्सव में आये हुए हैं, स्वयं श्रीहरि बाबाजी भी विराजमान हैं, ऐसे समय कैसे जायें ? जब दूसरे दिन दुर्घटना का विवरण सुना तो मैंने श्रीहरि बाबाजी से प्रार्थना की कि मुझे आज्ञा हो तो मैं ही “भैया ! तुम जाकर क्या कर लोगे । हो आऊँ। उन्होंने कहा, जो होना था वह तो हो गया। ये तो सांसारिक शिष्टाचार है। अव उनका शरीर तो वहां होगा नहीं।” बड़े लोगों की आज्ञा में ननु न च नहीं करना चाहिये। मैं चुप हो गया। किन्तु मेरे मन में एक विचित्र उथल-पुथल मच रही थी ।
सभी नियमों के अपवाद होते हैं। अपवाद ऐसे ही समयों के लिये हैं। जब पं० वागीशजी शास्त्री ने बताया कि अन्त समय महाराज ने तुम्हारी ही चर्चा करते हुए प्राणों का परित्याग किया है तो मुझसे नहीं रहा गया । शनिवार को प्रातः पुराणपाठ सुनकर तथा त्रिवेणी-स्नान करके शङ्करजी को साथ ले, मैं वायुयान द्वारा दिल्ली पहुँचा और वहाँ से श्री आदित्यनारायण के साथ उनकी मोटर द्वारा शाम के सात बजे वृन्दावन श्री महाराज के आश्रम में पहुँच गया । इस आश्रम पर मैं अनेकों बार आया हूँ। पर आज इसकी ओर जाने में भय लग रहा था । मोटर ज्यों-ज्यों आश्रम की ओर बढ़ती जाती थी त्यों-त्यों हृदय बैठता जाता था । वहाँ पहुँचने पर देखा आश्रम की श्री नष्ट हो गयी है। सर्वत्र एक उदासीनता का वातावरण छाया हुआ है। आश्रम के कण-कण से मानो विवाद फूट-फूटकर बह रहा है। उस समय वहां कोई दिखाई नहीं दिया। सब वस्तुएँ अस्त-व्यस्त पड़ी हुई थीं मेरा हृदय भर रहा था, मुझे रोना आ गया। रास-मण्डप में
पड़कर मैं रो पड़ा । मेरे रुदन को सुनकर भक्तगण इधर-उधर से एक-त्रित हो गये । श्री हरिबाबाजी ने कहा, “यहाँ आकर श्रीमहाराजजी की जो दशा सुनी उससे तो बड़ा आश्चर्य हुआ, उस समय उन्हें देह का अनुसंधान ही नहीं था ।
जो लोग उस दुर्घटना के समय वहाँ उपस्थित थे उनसे पता लगा कि उस दिन चैत्रकृष्ण चतुर्दशी सोमवार था । मध्याह्नोत्तर में वे नियमानुसार सत्संगभवन में पधारे । उस समय और भी बहुत से लोग कथा सुनने आते थे । आनन्दजी ‘भगवती कथा’ की निश्य कथा कहते थे । आते ही उन्होंने पूछा, “सूसी के उत्सव का क्या हाल है ?” आनन्दजी ने कहा, ‘महाराज ! अच्छा है। श्रीहरि बाबाजी पहुंच ही गये हैं, माँ श्री आनन्दतयी आ गयी हैं, यहाँ से श्री नित्यानन्दजी गये हैं। ओर चतुः सम्प्रदाय के रामदासशास्त्री आदि भी जानेबाले हैं। उत्सव बड़े आनन्द से हो रहा है। आप कोई चिन्ता न करें।” उनके मन में थी कि मेरे न जाने से वहां निराशा तो नहीं हुई। और भी उत्सव की एक-दो बाते पूछी। फिर ‘भागवती कथा’ आरम्भ हुई । वीसवे खण्ड की कथा हो रही थी, प्रह्लाद जी का प्रसङ्ग था । अध्याय की समाप्ति में एक पृष्ठ शेष था कि उसी समय एक पागल-सा व्यक्ति काला कम्बल औढ़े बगलमें कुट्टी काटने का गड़ासा दबाये वहां आया । महाराज तो नेत्र बन्द किये कथा में ध्यानमग्न थे। और भी बहुत से नर-नारि कथा श्रवण कर रहे थे। उसने आते ही महाराज के सिर पर गड़ासे का प्रहार किया। महाराज का हाथ ऊपर सिर पर गया कि उसने पुनः प्रहार किया। इसते उंगली कट गयी। उसने तीसरा प्रहार और किया। वे प्रहार इतना शीघ्रता से हुए कि किसी का उसे पकड़ने का साहस ही नहीं हुआ। एक बूढ़ी माई ने उसे प्रहार करने से रोका तब औरों ने भी दौड़कर पकड़ा। कुछ लोगों ने
आवेश में आ उसे मारा और वह तत्क्षण वहीं मर गया। महा-राज का शरीर कुछ स्थल था। उनके सिर से रक्त के फब्बारे छूट रहे थे । चारों ओर की भूमि रक्त रञ्जित हो गयी। उनके समीप ही हत्यारा मरा पड़ा था। वहां का दृश्य अत्यन्त वीभत्स था । सभी किंकर्त्तव्य विमूढ़ हो रहे थे। जितने मूह उतनी बाते । वस्त्र रक्त-रञ्जित हो गये थे । हाय ! विधाता की कैसी कुटिल गति है। जिस सिर पर मनों पुष्प चढ़े थे उसी पर ऐसा निर्दयतापूर्ण प्रहार ! जिस भूमि में नित्य ही कथा, कीर्तन, रास और रामलीला आदि होती थी, जो भूमि इत्र, गुलाब और चन्दनादिसे सींची जाती थी वही रक्तरंजित हो रही थी ! क्या कहा जाय, कुछ कहते नहीं बनता ।
मेरे जाने पर उनके कृपापात्रों ने बताया- वे पहले से ही कहा करते थे कि मैं ऐसे-वैसे थोड़े ही मरूंगा । रक्त की नदियाँ बहाकर जाऊँगा। वे कहते थे – ‘हम जानबूझकर इस प्रवृत्ति में फंसे हैं। तुम लोगों को यह शिक्षा देने के लिए कि कोई कैसा भी सिद्ध हो जो इझ प्रवृत्ति में फंसेगा उसे दुःख उठाना पढ़ेगा। जो कामिनी-काञ्चन संतो रखेगा उसको यही सब सहन करना पड़ेगा ।’
यथार्थ में बात यही है। महापुरुषों के जीवन की प्रत्येक घटना बड़ी भारी शिक्षा मिलती है। वे प्राणियों के उपकार के निमित्त खा अपने शरीर पर कष्टों को झेलते हैं । प्रभु ईसा मसीह अपने शिष द्वारा ही पकड़ाये गये और उन्हें शूली पर लटकाया गया। जहाँ पवित्र वलिदान से ही आज ईसाई धर्मका इतना प्रचार हुआ। महात गाँधी की हत्या भी तो उन्हीं के एक देशबन्धु ने की थी। देवी थे। को भी उन्हीं लोगों ने जीवित जलाया जिसकी स्वतंत्रता के लिये। प्राण पण से प्रयत्न कर रही थी। इस संसार की कुछ ऐसी उल्टी रीति है । महापुरुषों को संसार की ओर से यही पारितोरि
मिलता है।
महाराज का समस्त जीवन परोपकार में ही बीता था। वे निरा-श्रयों के आश्रय थे, दीनों के बन्धु थे और मुमुक्षुओं के सर्वस्व । उनके यहां कथा-कीर्तन का अखण्ड सत्र चलता रहता था। उनके सान्निध्य में सभी श्रेणी के पुरुष आश्रय पाते थे। परस्पर विरोधी विचार के व्यक्ति भी उनके पास रहते थे। वे परम सहिष्णु, धैर्यवान् और निर्भय थे । उनका सम्पूर्ण जीदन परमार्थ के कार्यों में ही व्यतीत हुआ था । इस समय उनकी आयु ७३ वर्ष के लगभग थी। फिर भी ज्ञानार्जन की उनकी इच्छा कम नहीं हुई थी। नित्य ही कुछ न कुछ नयी बात याद कर लेते थे। उन्हें कितने श्लोक कण्ठस्थ थे इसकी कोई गणना नहीं। मैं जाता तो अपनी दैनन्दिनी दे देते और कहते कि तुम्हें जो सुन्दर श्लोक याद हो इसमें लिख दो। उनका श्लोक उच्चारण का ढङ्ग ऐसा सजीव था कि उसके विषय को उच्चारण करते-करते मूर्तिमान् करके खड़ाकर देते थे। उनके गुण महान् थे । भक्तवृन्द उनका जीवन लिखना चाहते हैं। यहां मैं जीवन लिखने नहीं बैठा हूँ। मैं तो केवल उनका स्मरण कर रहा हूँ। ‘भागवती कथा’ लिखने में मुझे उनके द्वारा बड़ी स्फूर्ति मिलती थी । वे आनन्दके द्वारा उसे नित्य सुनते और सभी को सुनवाते थे । कवि की कृति की कोई कलाकार आदर करे- उसके लिये इससे बड़ा पुरस्कार और कुछ नहीं हो सकता । नया खण्ड निकालते ही सबसे पहले मैं श्री उड़िया बाबाजी और श्रीहरिबाबाजी के पास भेजता था। मेरे लिये यही बड़े सौभाग्य की बात थी कि ये महापुरुष उसे सुनते थे। इससे मुझे लिखने में प्रोत्साहन मिलता था ।