गोकर्णका आख्यान- धुंधकारी का उद्धार – क्रमसंख्या -2

गोकर्णका आख्यान-   धुंधकारी का उद्धार –क्रमसंख्या -12
भागवतके माहात्म्य को प्रतिपादित करनेहेतु सूतजी एक अन्य प्रसंग सुनाते हुए कहते हैं कि पूर्वकालमें तुंगभद्रा नदीके तटपर एक सुन्दर नगर बसा हुआ था, उस नगरमें आत्मदेव नामके एक ब्राह्मण रहते थे, उनकी पत्नी धुन्धुली कुलीन एवं सुन्दरी होनेपर भी जिद्दी स्वभावकी थी। वह स्वभावसे क्रूर, बकवाद करनेवाली और झगड़ालू थी। ब्राह्मण-दम्पती सब प्रकारसे सम्पन्न थे, पर उनके कोई सन्तान नहीं थी। जब उम्र अधिक हो गयी तो उन्होंने सन्तान प्राप्तिहेतु कई प्रकारके दान-यज्ञ किये, पर सन्तान नहीं हुई।
एक दिन दुःखी होकर वह ब्राह्मण वनको चल दिया। चलते-चलते उसे प्यास लगी तो एक तालाबके किनारे गया और जल पीकर वहीं बैठ गया। दो घड़ी बीतनेपर वहाँ एक संन्यासी आये। जब उन्होंने जल पी लिया तो ब्राह्मण उनके पास गया और अपनी व्यथा सुनायी। संन्यासीने कहा कि ब्राह्मणदेव ! माया-मोह छोड़ दो, कर्मकी गति गहन है- ‘गहना कर्मणो गतिः’ (गीता ४।१७) । सात जन्मतक तुम्हारे कोई सन्तान किसी प्रकार नहीं हो सकती। जब ब्राह्मण नहीं माना और प्राण त्यागनेको तैयार हुआ तो संन्यासीने एक फल देकर कहा कि यह फल अपनी पत्नीको खिला देना, इससे उसको पुत्र उत्पन्न होगा।
ब्राह्मण फल लेकर घर आया और सारा वृत्तान्त बताकर पत्नी (धुन्धुली) को फल दे दिया। पत्नी कुतर्की स्वभावकी तो थी ही, उसने सोचा गर्भधारणकी परेशानिये एवं प्रसवके पचडेमें कौन पडेः इसलिये उसने वह फार नहीं खाया और अपनी गायको खिला दिया। पतिसे झू ही कह दिया कि फल खा लिया है और गर्भवती होनेक नाटक करने लगी। दैवयोगसे उसी कालमें धुन्धुलीक बहनको भी बच्चा होनेवाला था। उसने बहनसे मन्त्रणाक वह पुत्र अपने घर बुलवा लिया और स्वयंका पुत्र बताक बहनको भी घरमें यह कहकर रख लिया कि मेरे स्तनों दूध नहीं है और इसका बच्चा मर गया है, यह में बच्चेको पाल देगी। धुन्धुलीने पुत्रका नाम धुन्धुकारी रखा आत्मदेव बड़ा प्रसन्न हुआ। तीन महीनेके अन्तरालसे उस गायने भी एक सुन्दर दिव्य कान्तिवाले बालकको जन दिया। उसे देखकर भी ब्राह्मण बड़ा प्रसन्न हुआ। बालकवे कान गौके कानों-जैसे थे, अतः आत्मदेवने उसका नाम गोकर्ण रखा।
काल बीतनेपर दोनों बालक जवान हो गये। उनमें गोकर्ण तो पण्डित और ज्ञानी हुआ और धुन्धुकारी बड़ा है दुष्ट निकला। धुन्धुकारी बड़ा क्रूर था। वह चोरी, हत्याएं करता और दीन-दुःखियोंको तंग करता था। वेश्याओंके जालमें फँसकर उसने माँ-बापकी पूरी सम्पत्ति नष्ट कर दी एक दिन माता-पिताको मार-पीटकर, वह घरके बर्तन-भाँड़े भी उठा ले गया।
इस प्रकार सम्पत्ति स्वाहा होते देख और कुपुत्रके कष्टोंसे आत्मदेव फूट-फूटकर रोने लगा और कहने लगा कि इससे तो सन्तानहीन ही अच्छा था। हाय! अब मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? इस तरह ब्राह्मण विलाप कर ही रहा था, कि उसी समय परम् ज्ञानी गोकर्ण  वहा आ पहुंचे
उन्होंने पिताको वैराग्यका उपदेश देते हुए बहुत प्रकारसे समझाया। पिताजी ! यह संसार असार है, स्त्री-पुत्रके मोह-मायामें न फँसिये। यह शरीर भी अपना नहीं है, यह तो कालका ग्रास है। मोह-ममताको छोड़ वनमें जाइये और भगवान्में मन लगाइये। आत्मदेव गोकर्णका कहना मानकर वनको चले गये और वहाँ भगवत्-भजनकर भगवान्‌के धामको पधारे।
यहाँ धुन्धुकारी रुपये-पैसोंके लिये माँको मारने-पीटने लगा। तंग आकर माँने एक दिन कुएँमें गिरकर जान दे दी। धुन्धुकारी पाँच वेश्याओंको ले आया और अपने घरमें रखा। उनकी इच्छाओंकी पूर्तिके लिये वह चोरीकर धन लाने लगा। वेश्याओंने सोचा कि इसकी चोरीकी वजहसे किसी दिन हम पकड़ी जायेंगी, इसलिये उन पाँचोंने मिलकर धुन्धुकारीकी हत्या कर दी। यहाँ कथाका एक सुन्दर संकेत यह है कि ये पाँच वेश्याएँ हमारी इन्द्रियाँ हैं और इन्हींकी इच्छापूर्ति, तृप्ति एवं तुष्टिके लिये मनुष्य नाना प्रकारके पाप, दुष्कर्म करता है और ये ही एक दिन उसके अन्तका कारण बनती हैं, इन्हींके जालमें फँसकर वह अपना अन्त स्वयं करता है। धुन्धुकारी अपने कर्मोंके कारण भयंकर प्रेत हुआ। वह बवंडरकी तरह चारों दिशाओंमें भटकता फिरता था तथा भूख-प्याससे व्याकुल हो चिल्लाता रहता था। गोकर्ण तीर्थयात्रापर गये हुए थे। वहाँ उन्होंने लोगोंके मुँहसे धुन्धुकारीकी मृत्युका समाचार सुना तो गयामें जाकर उन्होंने भाईका विधिवत् श्राद्ध किया। कुछ समय बाद गोकर्ण अपने नगर लौटे। रात्रिका समय था, अतः वे सीधे ही अपने घर गये और सो गये। रात्रिमें गोकर्णको सोया देख प्रेतरूप धुन्धुकारीने अपनी व्यथा सुनायी और
कहा कि मैं तुम्हारा भाई अपने पापकर्मोंके कारण प्रेतयोनिमें पड़ा हूँ, मुझे इससे मुक्ति दिला दीजिये।
धुन्धुकारीकी मुक्तिके लिये गोकर्णने भागवत सप्ताहरूपी ज्ञानयज्ञका आयोजन किया और स्वयं भागवत-कथा प्रारम्भकी। बड़ी संख्यामें श्रोता आये। प्रेत-योनिवाला धुन्धुकारी भी पवनरूपमें आया। अपने लिये कोई स्थान न देख वह वहाँ स्थित सात गाँठोंवाले बाँसकी पोरमें घुस गया और कथा सुनने लगा। कथा-समाप्तिपर प्रतिदिन एक विचित्र घटना घटती। रोज बाँसकी एक पोर चटक जाया करती थी। अन्तिम दिवस आखिरी गाँठ भी चटक गयी और धुन्धुकारी प्रेतयोनिसे छुटकारा पा दिव्य रूपमें प्रकट हुआ। बाँसकी ये सात गाँठें मनुष्यकी वासनाओं- काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर और अहं (अहंकार) की प्रतीक हैं। इनके हटते ही व्यक्ति अपने दिव्य स्वरूपमें आ जाता है। उसी समय वैकुण्ठसे पार्षदोंसहित एक विमान उतरा और धुन्धुकारीको उसमें बिठाकर ले गया। सभीने यह दृश्य बड़े विस्मयके साथ देखा। यह भागवत कथाको श्रद्धा-मननपूर्वक सुननेका परिणाम था। जैसे आगमें तपकर सोना कंचन बनता है, वैसे ही पश्चात्तापकी आगमें तपकर पापी भी पुण्यात्मा बन जाता है और फिर भक्ति एवं सत्संगके माध्यमसे मुक्ति प्राप्त करता है।
इसके बाद श्रावणमासमें गोकर्णने पुनः कथा कही। उसकी समाप्तिपर वहाँ बहुतसे विमान आये और गोकर्णसहित सभी श्रोताओंको वैकुण्ठ ले गये।
आत्मदेव-धुन्धुली-धुन्धुकारी-गोकर्णके इस सम्पूर्ण आख्यानसे भागवतकार हमें यह संकेत दे रहे हैं कि संसारमें आकर मनुष्यको भगवद्-भजन करते हुए सत्कर्म
करने चाहिये- ‘मामनुस्मर युध्य च’ (गीता ८।७)।
ईमानदारीसे अपना कर्तव्य पूर्ण करना चाहिये और भगवान् जिस हालमें रखें, उसमें प्रसन्न रहना चाहिये। परिवार, संसारकी कामनाओंके जालमें नहीं फँसना चाहिये। आत्मदेवका जीवन पूरी तरह सुखी था। पुत्रैषणाके कारण उसको जीवनमें भारी दुःख भुगतना पड़ा। इसी प्रकार धुन्धुलीके छल-कपट, ईर्ष्याके कारण उसे भी मुसीबतोंमें जीवन गुजारना पड़ा और अन्तमें आत्महत्यातक करनी पड़ी। मनुष्यको कर्तव्य कर्मोंके फलस्वरूप जो मिलता जाय, उसीको प्रभुका प्रसाद मानकर ग्रहण करते रहना चाहिये, अनावश्यक इच्छा-आकांक्षाओंकी मृगतृष्णाके पीछे नहीं दौड़ना चाहिये। आज व्यक्ति धन-दौलत एकत्र करनेमें तथा पद-प्रतिष्ठा प्राप्त करनेमें लगा है। हर व्यक्ति पूरी तरह तन और धनके पीछे पड़ा है, मनकी ओर उसका कोई ध्यान ही नहीं है। वह विषयोंके भँवर-जालमें उलझता जा रहा है, जबकि जीवन प्रतिपल मृत्युकी ओर बढ़ रहा है। मनुष्यका पूरा जीवन इसी आपाधापीमें गुजर जाता है।
अतएव भागवत कथा व्यक्तिको अपने सांसारिक कर्तव्यों एवं दायित्वोंका निर्वाह करते हुए स्वयंके आत्मोत्थानपर चिन्तन करनेहेतु प्रेरित करती है। कथाके गम्भीर चिन्तन, मननसे व्यक्ति मानव-जीवनकी महत्ताको समझकर अध्यात्मकी ओर उन्मुख होता है, और यह चिन्तन-मनन उसे मोक्षपथपर ले जाकर परमात्मासे साक्षात्कार कराता है।