गंगा जी का वेग साधा

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— परम पूज्य श्रीहरिबाबा जी महाराज का पावन चरित्र —

गवाँ के आस-पासका प्रान्त श्रीगङ्गाजीका खादर है। यहाँ वर्षा ऋतुमें बाढ़ आनेपर प्रायः प्रतिवर्ष जलभर जाता था । रामेश्वर के स्वास्थ्यलाभसे पाँच-सातवर्ष पूर्व यह बाढ़ इतने वेगसे आई थी कि गङ्गाजीकी एक बड़ी धारा महेवा नदीसे मिलकर एक हो गयी और प्रायः सात सौ ग्राम जलमग्न हो गए । ग्रामीण जनताकी यह घोर विपत्ति देखकर आपका कोमल चित्त बेचैन हो उठा और आपने असम्भवको सम्भव करनेके लिये गंगाजीका बाँध बाँधनेका निश्चय किया। इधर रामेश्वरका चित्त भी बहुत बेचैन रहता था। उसके पास कोई काम था नहीं, वह चौबीसों घण्टे आपके पास ही रहना चाहता था । अतः आपने उसे भी काममें लगानेका संकल्प किया । इसी दृष्टिसे आपने सन् १६२२ ई० के पौष मासमें पं० ललिताप्रसादसे कहा, “मैंने गंगाजीका बाँध बनानेका निश्चय किया है। यह काम आज ही आरम्भ करना है। तुम और रामेश्वर ही मेरे प्रधान सहायक हो। बड़ी सावधानीसे प्रेमपूर्वक व्यवहार करते हुए सारा काम तुम लोगोंको संचालित करना होगा । बाँधको साक्षात् भगवान्का स्वरूप जानकर उसकी सेवा तन, मन, धनसे करना हमारा परमधर्म है ।

फिर आपने सब काम अलग-अलग लोगोंको बाँट दिये । चन्दा करना अपने जिम्मे रखा। ‘श्रीराम जयराम-जय-जय राम’ इस मन्त्रका कीर्तन करते हुए फावड़ेसे स्वयं मिट्टी खोदकर मुहूर्त किया। कामके समय भी आप घण्टा बजाकर सबके साथ कीर्तन करते रहते थे।

बाँध पर प्रत्येक टोकरी भगवन्नामके साथ ही डाली गई है। अतः उस प्रान्तके लोगोंके लिए तो यह महान तीर्थस्वरूप है। उन दिनों अनेकों आर्त्तत् पुरुष सकाम भाव-से आते थे। आपके चमत्कारोंकी बड़ी ख्याति हो गई थी । आप सबको बाँधपर मिट्टी डालनेके लिए ही कहते थे । इसीसे बहुतोंको असाध्य संकटोंसे भी मुक्ति मिल गयी। आप सबको यही उपदेश देते थे, “यह बाँध साक्षात् अन्तर्यामी भगवानका ही स्वरूप है। यदि तुम इस काममें किसी प्रकारका कपट, चोरी, व्यभिचार या अन्य कोई कुकर्म करोगे तो याद रखो इस सर्वज्ञसे कोई बात छिपी नहीं रहेगी। उसके लिए तुम्हें अवश्य दण्ड भोगना पड़ेगा। इससे अर्थार्थी, आत्त, जिज्ञासु और ज्ञानी चारों प्रकारके भक्तोंको अपने-अपने ध्येयकी प्राप्ति होगी। संसारके बड़ेसे बड़े संकट भी बाँधपर मिट्टी डालनेसे दूर हो जायेंगे। आप लोगोंके सौभाग्यसे ही भगवानने ऐसा अवसर दिया है। मैं प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि यदि रामनवमी तक मिट्टीका काम समाप्त न हुआ तो मैं प्राण त्याग दूंगा।”

इस बातकी प्रसिद्धि बिजलीकी तरह दूर-दूर तक फैल गयी। यह तो मानो भगवान रामकी सेतुबन्ध लीला ही थी। लोग आपको साक्षात भगवान् ही मानने लगे । आप चन्दा इकट्ठा करनेके काममें जुट गये । खुर्जाके सेठ गौरीशंकर गोयनका और उझियानीके भदावर साहबने बाँधकी पूरी लागत देनी चाहयी, पर आपने स्वीकार नहीं की। जनजन के पास जाकर थोड़ा-थोड़ा चन्दा ही लिया। यह देखकर लाला कुन्दनलालने कहा, “यह आपकी क्या लीला है, चन्देके लिए आप इतना कष्ट उठाते हैं, किन्तु जहाँ मिलता है वहाँ लेते नहीं।” आप बोले, “लालाजी ! आप तो पैसेके कीड़े हैं। आपको तो पैसा ही पैसा सूझता है। भाई ! मैं जो लेता हूँ उसके बदलेमें इन्हें भी तो कुछ देना होगा।

वह वस्तु बहुत बड़ी होगी। सो उस दिव्य परमार्थ सुखमें जिसका जितना भाग है उसका उतना ही तन-मन-धन बाँध भगवान्‌की सेवामें लगेगा।” चन्दा सभी लोग बड़े उत्साहसे लिखाते थे। सभी परम उदार और परोपकारी हो गये थे। आप हिन्दू गाँवोंमें जाते तो ‘श्रीराम जयराम-जय-जयराम’ मन्त्रका और मुसलमानोंके गाँवोंमें जाते तो ‘तेरी जात पाक हूँ’ का कीर्तन कराते थे।

धीरे-धीरे चैत्र शु० ८ आ गयी। आपने पहले ही निश्चयकर दिया था कि रामनवमीतक मिट्टीका सब काम समाप्त हो जाय। बीच-बीचमें उस प्रतिज्ञाका स्मरण भी दिलाते थे। किन्तु एक क्रास बाँधपर कुछ काम शेष रह गया था। अष्टमीको आप यह देखनेके लिए चले कि काम पूरा हुआ है या नहीं। आप सीधे उसी स्थानपर पहुंचे जहाँ काम रह गया था। उसे अपूर्ण देखकर वहाँ काममें लगे हुए लोगोंके साथ आप भी जुट गये। परन्तु दूसरे दिनतक उसके पूरे होनेकी कोई सम्भावना नहीं थी। लोगोंने चलनेको कहा, परन्तु आप बोले, “अब मैं तो यहीं मिट्टी डालते-डालते प्राण त्याग दूंगा। मुझसे कोई न बोले, अब मैं मौन हूँ।” यह बात सुनकर सबके होश उड़ गये। तब ललिताप्रसादजीने कहा, “भाई ! हिम्मते मर्दा मददे खुदा । सब लोग जुट जाओ।” बस, सब पल्ला और कस्सी लेकर मिट्टी डालने लगे। आस-पासके गाँवोंसे भी बहुत लोग आ गये।

सब जगह बिजलीकी तरह यह समाचार फैल गया। कामकी एक आँधी-सी आ गयी। थोड़ी ही देरमें वहाँ मिट्टीका पहाड़-सा खड़ा हो गया । फिर आपने काम छोड़कर कहा “बस, भाई ! अब काम बन्द करो ।” उस समय हरिनामकी तुमुल ध्वनिसे आकाश गूंज उठा। दूसरे दिन रामनवमीको अपने हाथसे एक ककर बिठाकर आपने कंकरका मुहूत्त किया। उस समय उत्सव भी बड़ी धूमधामसे हुआ। सब ओर ‘श्रीहरि भगवान्‌की जय’ का घोष छाया हुआ था ।

इस प्रकार मिट्टीका काम तो चैत्र शु० ८ सं० १६८० वि० को ही पूरा हो गया। उसके पश्चात् ज्येष्ठ शु० १० तक कंकरोंसे सतरह ठीकरोंके मुह बनाये गये। इनमें कुछ ठोकरें तो छोटी थीं, किन्तु प्रायः दस बहुत बड़ी थीं । कंकरोंका मुख्य काम तो ज्येष्ठके दशहरातक समाप्त हो गया, किन्तु थोड़ा-थोड़ा काम तो वर्षा ऋतुमें भी चलता रहा। आश्विनमासमें विजयदशमीसे शरत्पूर्णिमा तक आपने बाँधका पहला उत्सव किया। बाँधकी लम्बाई प्रायः २४ मील है, इसमें प्रायः तीन मील बहुत ऊँचा और चौड़ा है। यह सब कार्य प्रायः छः महीने में पूरा हुआ । इसे एक प्रत्यक्ष चमत्कार कहा जाय तो अत्युक्ति न होगी। इतनी जल्दी यह काम राजकीय प्रयत्नसे भी होना सम्भव नहीं था ।