गृह-त्याग और संन्यास
इन दिनों आप मेडिकल कॉलेज लाहौरमें शिक्षा पा रहे थे। वहाँका पाठ्यक्रम समाप्त होनेमें एक वर्ष रह गया था, किन्तु इन्हें डॉक्टर तो बनना नहीं था। जीवनका लक्ष्य निश्चित हो चुका था; फिर उसकी ओर बढ़नेमें बिलम्ब क्यों किया जाता । अतः डिग्रीकी परवाह न करके उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और होशियारपुरमें गुरुदेवके आधममें ही रहने लगे। गुरुदेवका सेवा और सफाईपर बहुत जोर था। उनका कथन था कि सफाई ही खुदाई है; जो जितनी सफाई रखेगा उतना ही वह अपने लक्ष्य-की ओर अग्रसर होगा। अतः उनकी आज्ञा लेकर आप भी आधमकी सब प्रकारकी सेवा करने लगे। आरम्भसे ही आपमें आलस्यका सर्वथा अभाव था। उन दिनों रातको बहुत देरसे सोते, किन्तु दो बजे उठकर ही गुरुदेवको जल देते। वे शौचादिसे निवृत्त होनेके लिये बाहर चले जाते तो स्वयं ध्यानाभ्यासमें तत्पर रहते तथा उनके ८ बजे लौटनेसे पहले ही आधमको झाड़बुहारकर बरतन साफ करते और कुए पर वेंकुली बताकर स्नानघरकी टंकीमें पानी भर देते। फिर श्रीस्वामीजीको स्नान कराते और आश्रमके वृक्षोंको सींचते। इस प्रकार बाप सभी प्रकारकी सेवामें तत्पर रहते थे ।
आपने गुरुदेवके चरणोंमें कई वार प्रार्थना की कि मुझे संन्यास दीक्षा दे दीजिये। परन्तु उन्होंने स्पष्ट अस्वीकार करते हुए कहा कि हम किसीको साधु नहीं बनाते । जब समय आवेगा तो तुम स्वयं साधू बन जाओगे। वैराग्यकी उत्कट अवस्था आनेपर कोई साधु बने बिना नहीं रह सकता। अतः अभी तो तुम हमारे पास रहकर सेवा ही करो। आप बड़ी लगनके साथ गुरुदेवकी सेवामें तत्पर रहे। उसके प्रभाव और गुरुदेवके प्रसादसे इनका चित्त गुरुदेवके चित्तसे ऐसा अभिन्न हुआ कि उनका सारा ही अनुभव इनके हृदयमें उतर आया ।
आपका वैराग्य उत्तरोत्तर बढ़ता ही गया और आपको नाश्रमकी प्रवृत्ति असह्य हो गयी। अतः आप अध्ययनके लिये गुरुदेवकी आज्ञा लेकर काशी चले आये ।
कासीमें आप हिन्दू कालेजमें बी० एस-सी क्लासमें भर्ती हो गये तथा निर्वाहके लिये कुछ ट्यूशन कर लिये। किन्तु वैराग्यने इस कम को अधिक दिन नहीं बलने दिया। वैराग्यकी तीव्र ज्वालाने विधिविधानके जड़ गोंको भी असह्य कर दिया। अतः एक दिन अपना सव सामान दीन-दुखियोंको टिकर आपने स्वयं ही विद्व-त्संन्यास ले लिया। संन्यास लेनेपर तो अब निरन्तर ब्रह्म चिन्तन होने लगा। अतः आप श्रीकाशीजीकी परिक्रमामें शूलटकेश्वर महादेव के मन्दिरमें रहने लगे। यह स्थान अत्यन्त निर्जन होनेके कारण नापको अत्यन्त प्रिय था। यहाँ जापका अभ्यास खूब बढ़ा। चित्त सब प्रकारके व्यव हारसे उपराम होकर अपने ही स्वरूपभूत प्राणाराध्यसे अभिन्न होनेके लिये उत्सुक रहने लगा। पासमें कमण्डलु भी नहीं था। एक पीतलका लोटा था, उसीसे अपनी दैनिक चर्याका निहि कर लेते थे। सन्तसमागम होता ही रहता था। कभी-कभी भारतधर्म-महामण्डलके स्वामी दयानन्दजी और उनके गुरु स्वामी ज्ञानानन्दजीसे भेंट हो जाती थी।
किन्तु इस विरक्तिमें भी आपका चित्त कितना पर-दुःखकातर था, इस विषय में यहाँ एक घटनाका उल्लेख किया जाता है। उसे आपके ही शब्दोंमें सुनिये – “एक दिन मैं शूलटंकेश्वर मन्दिरमें बैठा हुआ था ।
अकस्मात् एक बहुत ही दुर्बल मनुष्य वहाँ आया और कहने लगा, ‘बाबा ! मैं बड़ा दुखिया हूँ, मेरी कुछ सहायता करो ।’ मैंने पूछा, ‘बोलो, तुम क्या चाहते हो ? मुझसे जो बनेगा सेवा करूँगा।’ वह बोला, ‘बाबा ! मैं बहुत बीमार हूँ और इलाज करानेके लिये पटियाला जाना चाहता हूँ, परन्तु किरायेके लिये मेरे पास एक पैसा भी नही है ।’ मैंने कहा, ‘तुम घबराओ मत । बीमारी तो सभीको हो जाती है। चलो, तुम्हें रामकृष्ण मिशनके अस्पतालमें भर्ती करा दूँ। वहाँ तुम नीरोग हो जाओगे ।’ उसने कहा, ‘मैं वहाँ हो आया हूँ। मेरा रोग असाध्य है । यहाँ उसकी चिकित्सा नहीं हो सकती। पटियाला में एक वैद्य है। मेरे साथ इस रोगकी चिकित्सा करते हैं। अतः वहाँ जानेरी मेरे प्राण बच सकते हैं। नहीं ती में मर जाऊँगा। उसकी बात सुनकर मैं बड़े असमंजसमें पड़ा किया। मैंने तो यह नियम किया है कि पैसा हाथ नहीं शुऊँगा। अब यह घटना सामने उपस्थित है। क्या जाने, भगवान् मेरी परीक्षा करते हों। मैंने कहा, ‘अच्छा तुम गाँवमें बती। मैं मौगूँगा, तुम लेते जाना। वह बोला, ‘बाबा। मुझमें चलनेका सामर्थ्य नहीं है, कर सकें ती आप ही मेरी सहायता करें।’ मैंने कहा, ‘अच्छा भाई, मैं प्रयत्न करूंगा। हीना न होना भगवान्के अधीन है।” दीपहरको भिक्षाके समय मैंने लोगोंने इसकी चर्चा की और इसमें अपनी श्रद्धाके अनुसार सहायता करनेको कहा। ऐसा कहकर मैंने एक झोली बना ली। उस समय उस गाँवमें प्लेगका प्रकोप था। एक बीमार कष्टसे रो रहा था। मैंने उसे डाँडस बंधाया और कहा कि तू मुझे एक पैसा दे, तू अच्छा हो जायगा । उसने ऐसा ही किया और वैवयोगरी ठीक हो गया। फिर तो और सब लोग भी मेरी ओलीमें पैसे डालने लगे। वे सब गरीब थे। जब मैंने देखा कि काफी पैसे हो गये हैं तो मैं रोटी लेमार चला आया । मन्दिरमें बाकर मैंने पैसे एक और रखार ईटसे दबा दिये और जब वह रोगी आया तो उसे बता दिये। उसने गिने ती ठीक उतने ही निकले जितने वह चाहता था।”
शूनटंकेश्वरमें रहते समय ही आपकी स्वामी शंकरा-नन्द नामक एक बंगाली सन्त मिले। उन्होंने आपको कमण्डलु दिया और कहा कि प्रयागसे आगे द्रौपदी घाट-पर हमारा आश्रम है, वहाँ आमा। अतः कुछ दिन पश्चात् आप गंगातटपर विचरते-विचरते द्रौपदी घाट बले आये। स्वामीजी गंगातटपर ही एक सुन्दर एकान्त कुटीमें रहते थे। उसके पास ही एक कच्ची गुफा थी। स्वामी जीओ आग्रहसे आप उस गुफामें ठहर गए। उनका विशेष आग्रह होनेके कारण कुछ दिन भोजन भी उनके पास ही करते रहे। फिर मधुकरी करनेके लिये उनसे अनुमति ले श्री । आप सप्ताहमें केवल एक दिन मधुकरी करते थे। उस दिन पूरा भोजन पाते थे। फिर बची हुई रोटियोंको पपेटकर भूमि गाड़ देते थे और प्रतिदिन एक-एक रोटी निकालकर पानी भिगोकर खाते थे। बस, उस दिनका यही आहार होता था। फिर चीवीस घंटे तक कुष्ठ नहीं खाते थे। उन दिनों आप हर समय उन्मनी अवस्थामें रहते थे। पास ही एक काला सर्प पड़ा रहता था। कभी-कभी वह आपके आसनके नीचे भी जा जाता था। जोगीन ती समाधिस्थ रहनेक समय उसे आपके मस्तकपर बैठा हुआ भी देखा था। इस प्रकारकी चयसि उधरके लोगों में आपके प्रति श्रद्धा-भक्ति बढ़ने लगी और उनका आना-जाना भी बढ़ गया। अतः तीन साल रहनेके पश्चात् आप वहाँस चल दिये। मार्गमें कभी संकल्प फुरता ती मधुकरी लेते थे, नहीं तो पांच-सात दिन विना भिक्षा ही निकल जाते थे। आपकी याद भी नहीं आती थी कि भिक्षा करना भी शरीरका धर्म है।
इस प्रकार सानन्द विचरते आप पुनः होशियारपुरमें गुरुदेवके आश्रममें पहुंच गये। आपने उनसे बाशा लिये बिना स्वयं ही कपड़े रंग लिये थे, अतः उनके सम्मुख जानेमें बहुत सकुचाते थे। इसलिये डरते-डरते रात्रिमें उनके पास गये और बरणोंमें प्रणाम करके रो पड़े। जब उन्हें मालूम हुआ कि ये दीवानसिंह हैं और अब साधु हो गये हैं तो बड़े प्रसन्न हुए और बोले, “बेटा । तुम कृतार्य हो गये और मुझे भी कृतार्थ कर दिया। तुम तो जन्मसे ही साधु थे। अब स्वयं ही साधु हुए ही, इसलिये तुम्हारा नाम ‘स्वतः प्रकाश’ होगा।” इस प्रकार स्वामीजीको प्रसन्न देखा तो आपके आनन्दका पारावार न रहा और आश्रममें रहकर फिर सेवामें संलग्न रहने लगे ।
गुरुदेवका शासन बहुत कठोर था। वे सेवाके लिये किसीको कोई काम बताते नहीं थे। अतः आप उबकी मनोवृत्तिको समझकर ही समयानुकूल उनकी सेवा करते थे। आप कहा करते थे कि उत्तम सेवक तो वही है जो बिना बताये ही स्वामीके हृदयको समझकर ठीक-ठीक सेवा करता है। मध्यम यह है जो कहनेपर करे। और जो कहनेपर भी ठीक-ठीक नहीं कर पाता वह तो शिष्य या सेवक कहलानेका अधिकारी ही नहीं है।
कुछ दिन वहाँ रहनेके पश्चात् वहाँके प्रवृत्तिपूर्ण वातावरणसे आप फिर उपराम हो गये। अतः वहाँ से कहीं अन्यत्र जानेका निश्चय कर लिया। एक दिन किसी से बिना कुछ कहे चल दिये। कई स्थानोंमें विचरते रहे। इस प्रकार घूमते-घूमते आनन्दपुर साहब पहुंचे और वहाँके बड़े गुरुद्वारेमें रहने लगे। वहाँके लंगर में इतना बड़ा देग था कि जिसमें आदमी खड़ा हो सकता था। उसे माँजनेका काम आपने अपने जिम्मे ले लिया तथा एक गुरुमुखीके ग्रन्थसे दश गुरुओंका भी सुनाने लगे । वहाँक लंगरमें जो सामान्य भोजन बनता था उसीसे निर्वाह कर लेते थे और पंजाबकी कड़ाकेकी सर्दी होनेपर भी रात्रिमें तीन बजे उठकर तालाबमें स्नान करके एक सामान्य-सी चादर ओढ़कर प्रातःकाल पर्यन्त ध्यानस्थ होकर बैठे रहते थे । जीवन-चरित्र
इस प्रकार बहुत दिन आनन्दपुर साहबमें रहे। फिर जिनौडी चले आये। यहाँ विश्वामित्र नामके एक सन्त रहते थे । वे बड़े शौकीन साधु थे। उनकी कुटीमें सामान भी बहुत था। आप अपने गुरु भाई श्रीपरमा-नन्दजी गिरिके पास रहते थे, किन्तु नित्यकर्मसे निवृत्त होनेके लिये वहाँसे दो मील दूर श्रीविश्वामित्रजीकी कुटीपर जाते थे । एक बार संतजी किसी कार्यवश बाहर गये।
कुटियापर एक चौकीदार छोड़ दिया और आपसे भी देख-भाल रखनेके लिये कह गये । एक दिन आपने देखा कि चौकीदारने बहुत-सा सामान बाँध लिया है और वह उसे ले जाना चाहता है। आपको देखकर वह संकोच करने लगा और भागनेको तैयार हुआ । तब आपने सम-झाया कि तू घबरा मत, मैं तुझसे कुछ नहीं कहूँगा। पर एक बात मान ले कि इसमें से वह सामान तो निकाल दे जो स्वामीजीके मतलबका है और जो वस्तुएं तेरे कामकी हों वे भले ही और भी बाँध ले। तू ऐसी चीज मत ले जो तुझे बेचनी पड़े। परन्तु एक बात सोच ले कि यह मनुष्य जन्म बड़ी कठिनतासे मिला है। यह चोरी करनेके लिये नहीं है। अतः यदि तू उचित समझे तो आजसे चोरी करना छोड़ दे और भगवान्का भजन किया कर । इस उपदेशका ऐसा प्रभाव पड़ा कि कुछ दिनोंमें वह साधु हो गया। पीछे जब सन्त विश्वामित्रजीको इस घटनाका पता लगा तो उनके हृदयपर भी इसका बहुत अच्छा प्रभाव पड़ा। उन्होंने अपना सब सामान दीन-दुखियोंको बाँट दिया और स्वयं मधुकरी वृत्तिसे रहने लगे इसके पश्चात् कई स्थानोंमें विचरते आप गंगातटपर चले आए।
