ज्ञान से भक्ति की ओर
वर्धामें आप प्रातःकाल २ बजे ही उठ जाते। फिर नदी पर जाकर शौच-स्नानसे निवृत्त हो ध्यान करते और वहाँसे लौटकर सूर्योदय होनेपर वेदान्तका स्वाध्याय करते। फिर उसे विचारते। मध्याह्नमें भोजन और विश्राम होता। फिर ३ से ५ बजे तक कथा-श्रवण करते और सायंकालमें कुष्छ भ्रमण हो जाता । किन्तु सायंकाल के पश्चात् आपका कोई निश्चित कार्यक्रम नहीं था अतः किसी सत्सङ्गकी खोज करने लगे । खोजनेपर आपको मालूम हुआ कि वहाँ हनुमानगढ़ी नामका एक स्थान है, जहाँ समर्थ गुरु रामदासजीके समयसे ही ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ इस महामन्त्रका अखण्ड संकीर्तन चल रहा है। श्रीपरांजपेजी वहाँके अधिष्ठाता हैं। वे अच्छे विद्वान् और भगवद्भक्त महापुरुष हैं। उनके कथा-कीर्तन बड़े समारोहसे चल रहे हैं ।
आप वहाँ सूर्यास्तके पश्चात् नित्यप्रति जाने लगे और बड़े मनोयोगसे संकीर्तन सुनने लगे। इससे आपको बड़ा सुख मिला और धीरे धीरे उस संकीर्तनमें आपको भावसमाधि होने लगी, तथा अष्ट सात्त्विक भावोंका उद्गम होकर आपके हृदयको भाव-तरंगें उथल-पुथल करने लगीं। आपने अपनेको सावधान रखनेकी बहुत चेष्टा की; किन्तु अब हृदयपर अपना अधिकार न रहा । आपका ऐसा सात्त्विक भाव देखकर श्रीपराञ्जपेजी और उनके साथी आपकी ओर आकर्षित हुए। वे पहलेसे ही एक सुन्दर-सा आसन बिछा देते थे और गलेमें पुष्पमाला डालकर भगवत्प्रसादी चन्दन लगा देते थे। यह क्रम कई महीनों तक चलता रहा। अपने भावोंको आपने बहुत रोका, पर कहाँ तक रोकते। एक दिन एक साथ ही अश्रु, पुलक, स्तब्धता, स्वेद, कम्प, वैवर्ण्य, स्वरभंग और मूर्च्छा आठों सात्त्विक विकार प्रकट हो गये ।
कुछ जब उन लोगोंने आपके शरीरमें यह भावसंघर्ष देखा तो अवाक् रह गये। मेघोंकी धाराओके समान आपके नेत्रोंसे निरन्तर अश्रुवर्षण हो रहा था। प्रत्येक रोमकी जड़से गाठें पड़कर बार-बार रोम खड़े हो जाते थे और उनसे रक्तके कण निकल आते थे। शरीरसे फव्वारों-की तरह पसीना बह रहा था, सारे शरीरमें कम्प व्याप्त था, जैसे झंझावातसे केलेका पत्ता काँप रहा हो। बोलना चाहते तो स्वर-भंगके कारण स्पष्ट शब्द नहीं निकलता था । शरीरका रंग कभी पीला, कभी मेघश्याम, कभी श्वेत और कभी अरुण हो जाता था। नेत्र कभी कमलके समान उत्फुल्ल, कभी अर्धोन्मीलित और कभी मुकुलित हो जाते थे। इस प्रकार कुछ कालतक भाव-संघर्ष रहा, फिर आप मूच्छित हो गए।
श्रीपराञ्जपेजी तथा अन्य भक्तोंने उस मूर्च्छावस्थामें ही आपको बड़ी श्रद्धासे ठाकुरजीके सामने एक कालीन पर लेटा दिया। तब आप मेघगम्भीर नादसे बारम्बार हुंकार करने लगे। पहले तो लोगोंके देखते-देखते भगवान्की ओर पैर करके लेट गये, और भगवान्को एक ओर खिसकाकर उनके सिहासन पर जा विराजे। इस भगवदीय आवेश और तेजको देखकर भक्तोंके आनन्दका पारावार न रहा। उन्हें तो मानो श्रीश्यामसुन्दरकी गिरिराज लीलाका अथवा श्रीमन्महाप्रभुकी महाप्रकाश लीलाका प्रत्यक्ष दर्शन हो गया।
उस समय भक्तोंको अपने-अपने भावोंके अनुसार विभिन्न रूपोंमें आपके दर्शन हो रहे थे। फिर आपने मेघगम्भीर वाणीसे कहा, “भोग लगाओ।” यह सुनकर भक्तोंको बड़ा आनन्द हुआ। सबने भोग लगाया । कितना पा गये, इसका ठिकाना नहीं। अन्तमें प्रभु बोले, “वर माँगो।” सब भक्तोंने अभीष्ट वर माँगे और आपने सबको ‘एवमस्तु’ कहा। तदनन्तर सबने आरती और स्तुति करके चरणोंमें साष्टांग प्रणाम किया। फिर सब लोग खोल-करताल लेकर संकीर्तन करने लगे। आजका संकीर्तन कुछ विचित्र ही था। आज तो मानो प्रेमावतार श्रीशचिनन्दन स्वयं ही वेष बदलकर इस रूपमें प्रकट हुए थे। जब भक्तगण संकीर्तनानन्दमें विभोर हो गये तो प्रभु उठकर सबके साथ स्वयं नृत्य करने लगे। आप दोनों भुजाएँ उठाकर विचित्र गतिसे नृत्य कर रहे थे। तब जो अनूठी शोभा हुई उसने भक्तमण्डलीके बीचमें नृत्य करती श्रीगौरचन्द्रकी कनक-कमनीय मूर्तिको ही नेत्रोंके सामने प्रकट कर दिया। बस, आनन्दका एक बाजार-सा लग गया। कोई प्रभुके चरणोंमें पड़कर रो रहे थे, कोई खिलखिलाकर हँस रहे थे और कोई किन्हींके गलेसे लिपटे हुए थे। इस प्रकार सारी रात्रि बीत गयी। जब प्रातःकाल हुआ तो आप अकस्मात् हुंकार करके पृथ्वीपर गिर गये । भक्तोंने अनेकों उपचार किये तब आपको चेत हुआ । चेत होनेपर आपको बहुत संकोच भी हुआ, किन्तु पराञ्जपेजीने सान्त्वना देकर आपको शान्त कर दिया ।
अब आप नित्य-प्रति सायंकालमें हनुमानगढ़ीके संकीर्तनमें सम्मिलित होने लगे। इससे उस संकीर्तनका रंग कुछ और ही हो गया। वह संकीर्तन-सरिता ऐसी उमड़ी कि सारे आश्रमको प्रेम-रससे सराबोर करती अड़ोस-पड़ोसको भी आप्लावित करने लगी। धीरे-धीरे यह बात श्रीअच्युत मुनिजीके कानोंतक भी पहुंची । उन्हें यह रुचिकर न हुई। वे बहुत बिगड़े और आपके भावपरिवर्तनकी भर्त्सना करने लगे। किन्तु आप पर तो भक्तिमहारानीका रंग चढ़ चुका था। अन्तमें आपको उनका सम्पर्क छोड़ना ही पड़ा ।
भक्तवर ललिताप्रसादजी लिखते हैं ‘अपनी वर्धाकी घटनाके विषयमें उन्होंने स्वयं बताया था कि पहले मैं ब्राह्मी स्थितिके नित्य सुखमें मग्न रहता था। उसी समय वहाँ संकीर्तनमें अकस्मात् मेरी विचित्र अवस्था हुई । मेरा ‘सोऽहम्’ भाव ‘दासोऽहम्’ में बदल गया और ऐसी मस्ती चढ़ी कि मुझे कुछ भी होश न रहा। उस समय श्रीराम-कृष्णादि अवतारोंके तथा नाम, धाम और लीला इन भगवत्स्वरूपोंके सब रहस्य मेरे हृदयमें स्पष्ट दिखाई देने लगे । मुझे स्पष्ट अनुभव हुआ कि दास्य, सख्य, वात्सल्य और माधुर्य भावोंके द्वारा सगुण ब्रह्मकी लीलाओंका अनुभव होना ब्राह्मी स्थितिसे आगे की बात है। वैष्णव शास्त्रोंमें तो रस-विकासका यही क्रम है। पहले शान्तरस और फिर क्रमशः भक्तिके दास्य, सख्य, वात्सल्य और माधुर्य रसका अनुभव होता है। मेरे विचारसे तो वेदान्तियोंका सगुण ब्रह्म-खण्डन और वैष्णवोंका निर्गुणखण्डन बिना अनुभवके केवल बुद्धिका विलासमात्र है। वास्तवमें तो दोनों एक ही हैं तथा ज्ञान और भक्तिमें कोई भेद नहीं है। किसी भी सच्चे ज्ञानीसे भक्तिके रहस्य छिपे नहीं रह सकते और कोई भी सच्चा भक्त अज्ञानी नहीं रह सकता। पूर्णता होनेपर सारा भेद अपने-आप खुल जायगा । रास्ते भिन्न हैं, गन्तव्य स्थान तो एक ही है। साधनोंको भले ही भिन्न-भिन्न मान लो, साध्य तो एक ही है ।
गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं-
अगुहि सगुर्णाह र्नाह कछु भेदा । उभय हर्राह भव-सम्भव खेदा ॥
अस्तु, अब आप निरन्तर हनुमानगढ़ीमें ही रहने लगे । आपकी चमत्कारपूर्ण अवस्थाओंको देखकर श्री-पराञ्जपेजीको श्रीमन्महाप्रभुजीका स्मरण हुआ । उन्होंने कुछ दिन पूर्व ही अँग्रेजीमें भक्तवर श्रीशिशिरकुमार घोषकृत लॉर्ड गौराङ्ग (Lord Gaurang) नामकी पुस्तक पढ़ी थी। उन्होंने उसका स्मरण हुआ और उसे अपने पुस्तकालयसे निकालकर आपको देते हुए कहा, “अद्भुत ग्रन्थ है, इससे आपको बहुत सुख मिलेगा ।”
आपने बड़े भावपूर्वक वह पुस्तक पढ़ी । उससे सच-मुच आपको बड़ा आनन्द मिला । फिर श्रीपराञ्जपेजीके आग्रहसे आप सत्संगियोंको उसकी कथा सुनाने लगे । इससे भक्तोंपर दिनोंदिन आपका प्रभाव बढ़ने लगा । प्रेमकी ऐसी तरङ्ग उठी कि भक्तगण उसीमें सन्तरण करने लगे । आपकी ख्याति भी बहुत बढ़ गयी और भक्तोंकी भीड़ रहने लगी । अतः एक दिन रात्रिमें आप चुप-चाप वहाँसे चल दिये और उसके पश्चात् फिर कभी वहाँ नहीं गये ।
